☀ प्रभु प्रेमी संघ ? 22 फरवरी, 2024 (गुरुवार)

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पूज्य सद्गुरुदेव आशीषवचनम्
।। श्री: कृपा ।।
? पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – हिन्दी मात्र भाषा नहीं, अपितु भारतीयता के भावों की दिव्य अभिव्यक्ति है। भाषा, व्यवहार, विचार और संवेदनाओं के संप्रेषण का प्रथम स्वर मातृभाषा का ही है। अतः मातृभाषा हमारे मानसिक व बौद्धिक विकास की दृष्टि से अधिक उपयोगी है। घर, कार्यालय, प्रतिष्ठान और सर्वत्र गर्व से अपनी भाषा का प्रयोग करें …! मात्र भाषा नहीं, मातृभाषा है – हिन्दी। जन-जन की अभिलाषा है – हिन्दी। देश की उपासना है – हिन्दी। संस्कृति, संस्कार, मूल्यों की संवाहक है – हिन्दी। सदियों से हर भारतीय के शब्दों की शक्ति है – हिन्दी। हिन्दी भाषा अभिव्यंजना की अपार क्षमता से पूर्ण एक समृद्ध भाषा है। कोई राष्ट्र अपने गौरव में वृद्धि करता है तो वैश्विक दृष्टि से उसकी प्रत्येक विरासत महत्त्वपूर्ण हो जाती है। परम्पराएँ, नागरिक दृष्टिकोण और भावी सम्भावनाओं के केन्द्र में ‘भाषा’ महत्त्वपूर्ण कारक बनकर उभरती है, क्योंकि अंतत: यही संवाद का माध्यम भी है। भाषा अभिव्यक्ति का साधन होती है। भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम होती है। हमारी भावनाओं को जब शब्द-देह की प्राप्ति होती है तो हमारी भावनाएँ चिरंजीव बन जाती हैं। इसलिए भाषा उस शब्द-देह का आधार होती है। सम्पूर्ण भारत को एक सूत्र में पिरो कर रखने वाली हम सबकी भाषा हिन्दी सम्पूर्ण भारत की जन भाषा, राष्ट्रभाषा और राजभाषा है। हिन्दी हमारा गौरव है। यह जन-जन की आशा और आकांक्षाओं और हम भारतीयों की पहचान है। जब भी बात देश की उठती है तो हम सब एक ही बात दोहराते हैं – हिन्दी हैं हम, वतन हैं हिंदोस्तां हमारा’। यह पंक्ति हम हिंदुस्तानियों के लिए अपने आप में एक विशेष महत्त्व रखती है। हिन्दी अपने देश हिंदुस्तान की पहचान है। यह केवल भावों की अभिव्यक्ति मात्र न होकर हृदय स्थित सम्पूर्ण राष्ट्रभावों की अभिव्यक्ति है। हिन्दी हमारी अस्मिता की परिचायक, संवाहक और रक्षक है। सही अर्थों में कहा जाए तो विविधता वाला भारत अपने को हिन्दी भाषा के माध्यम से एकता के सूत्र में पिरोए हुए है। भारत विविधताओं का देश है। यहाँ पर अलग-अलग मत, पंथ सम्प्रदाय व जाति के लोग रहते हैं, जिनके खान-पान, रहन-सहन, वेशभूषा एवं बोली आदि में बहुत अन्तर है। लेकिन फिर भी अधिकतर लोगों द्वारा देश में हिन्दी भाषा ही बोली जाती है। हिन्दी भाषा हम सभी हिंदुस्तानियों को एक-दूसरे से जोड़ने का काम करती है। वास्तव में हिन्दी हमारे देश की राष्ट्रीय एकता, अखण्डता एवं समन्वय का भी प्रतीक है। आइये ! हम हिन्दी के प्रसार के लिए कृत-संकल्प होकर एक स्वर से कहें कि ‘हिन्दी हमारे माथे की बिन्दी है’। हमें यह प्रण भी लेना होगा कि हम हिन्दी को अपने उस शीर्षस्थ स्थान पर प्रतिष्ठित कर दें कि हमें हिन्दी दिवस मनाने जैसे उपक्रम न करने पड़ें और हिन्दी स्वत:स्फूर्त भाव से मूद्र्धाभिषिक्त हो। हमें अपनी भाषा से प्रेम और आत्मीयता विकसित करते हुए इसके सही उपयोग के प्रति सचेष्ट रहना चाहिए। यदि हमारी प्रतिबद्धता निरन्तर सजग और उत्साही बनी रही तो वह दिन दूर नहीं, जब हमारी भाषा हिन्दी विश्व में सिरमौर होगी। इस गौरवमयी मातृभाषा दिवस पर समस्त साहित्यसाधक, सुधी मनीषियों, लब्धप्रतिष्ठ महानुभावों, शिक्षा व साहित्य की श्रृंखला से जुड़े हरेक व्यक्तित्व को प्रत्येक भारतीय को अनेकानेक शुभकामनाएँ …।
? पूज्य “प्रभुश्री” जी ने कहा – हिन्दी भाषा देश की अधिकतम जनता के लिए सुगम है। इसकी लिपि व शब्दावली प्रत्येक क्षेत्र के लिए उपयोगी तथा अनुकरणीय है। संस्कृत भाषा के शब्द प्राय: सभी भारतीय भाषाओं में मिलते हैं। अत: हिन्दी की प्रकृति संस्कृत के अधिक समीप है। इसमें ज्ञान, विज्ञान, अध्ययन आदि सभी विषयों को व्यक्त करने की क्षमता है। हिन्दी भाषा इतनी सर्वग्राही व लचीली है कि वह प्राय: सभी प्रकार के प्रचलित भावों, ज्ञान, विज्ञान और प्रचलित शब्दों को अपनाने में समर्थ है। हिन्दी भाषा का प्रसार न केवल भारत में ही है, बल्कि विदेशों में भी अधिक हो रहा है। अनेक विदेशी विश्वविद्यालयों ने हिन्दी को अपने पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया है। इस प्रकार यह भाषा न केवल प्रदेशों को, बल्कि अन्य देशों को एक-दूसरे से जोड़ती है। भारत की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ की धार्मिक व सांस्कृतिक परम्पराएँ हैं। यहाँ के लोग तीर्थ यात्रा के लिए सारे देश से समान रूप से जाते हैं। यह भावना सांस्कृतिक एकता को सुदृढ़ करती है। भारत में प्रत्येक प्रान्त की बोलियाँ भिन्न हैं। इन सबको जोडऩे वाली हिन्दी ही एकमात्र ऐसी भाषा है, जो करोड़ों लोगों को एक सूत्र में पिरोए है। भारतीय लोगों की विशेषता है – अनेकता में एकता तथा विभिन्नता में समानता। हिन्दी भाषा इस प्रकार पूरे राष्ट्र को एक बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण योगदान कर रही है। हमारे देश की महान विभूतियों ने भी हिन्दी को प्रोत्साहित करने के लिए पुरजोर समर्थन दिया है। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने हिन्दी को जनमानस की भाषा कहा था। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने कहा था कि जिस देश को अपनी भाषा और साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता। आचार्य विनोबा भावे ने कहा था कि मैं दुनिया की सभी भाषाओं का सम्मान करता हूँ पर मेरे देश में हिन्दी का सम्मान न हो, यह मैं सह नहीं सकता। हिन्दी केवल भाषा या संवाद का ही साधन नहीं है, बल्कि हर भारतीय के बीच सामाजिक और सांस्कृतिक सेतु भी है …।

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