०प्रतिदिन विचार(22/02/2024)कुछ तो साख रहने दीजिए -राकेश दुबे

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मेरे सामने एक रिपोर्ट है – यूनाइटेड नेशंस डेवलपमेंट प्रोग्राम (यूएनडीपी) की, ग्लोबल मल्टीडाईमेंशनल पावर्टी इंडेक्स 2023 इसका शीर्षक है । ख़ास बात इस रिपोर्ट को सरकार भी बकवास या झूठा नहीं बता सकती है, क्योंकि इसका सन्दर्भ नीति आयोग की अनेक रिपोर्ट में है, और इसी के आधार पर नीति आयोग ने इंडिया नेशनल मल्टीडाईमेंशनल पावर्टी इंडेक्स तैयार किया है।
यूएनडीपी की रिपोर्ट के अनुसार भारत ने बहुआयामी गरीबी को दूर करने के क्षेत्र में बहुत बेहतर कार्य किया है, जिसके कारण वर्ष 2005-2006 से 2019-2021 के बीच के 15 वर्षों में 41.5 करोड़ व्यक्ति गरीबी रेखा से ऊपर पहुँच गए। इसी के आधार पर नीति आयोग ने बताया था कि 2015-2016 से 2019-2021 के 5 वर्षों में 13.5 करोड़ व्यक्ति गरीबी रेखा से बाहर आये। यदि आप अभी तक एक स्वतंत्र विश्लेषक सोच रखते हैं तब इन आंकड़ों से समझ सकते हैं कि वर्ष 2005-2006 से 2015-2016 के बीच 28 करोड़ लोग गरीबी रेखा पार कर गए थे, और लगभग इस पूरे दौर में मनमोहन सिंह की सरकार थी, जिसकी अनर्गल आलोचना मोदी सरकार की गारंटी है। यदि 5 वर्षों में 13.5 करोड़, जो मोदी सरकार की गारंटी है, की तुलना में मनमोहन सिंह सरकार के 10 वर्षों के दौरान गरीबी रेखा से बाहर आने की गति अधिक तेज थी।
मोदी सरकार में अत्यधिक गरीबी के आंकड़े ही एक मनोरजन का विषय बन गए हैं। 3 जनवरी 2024 को उत्तर प्रदेश में विकसित भारत संकल्प यात्रा में हिस्सा लेते हुए मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने मोदी जी को विकास का मसीहा बताते हुए कहा था कि पिछले साढ़े नौ वर्षों के दौरान देश में 13 करोड़ लोग अत्यधिक गरीबी से मुक्त हो गए हैं। 7 फरवरी 2024 को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अपने भाषण में बताया था कि पिछले 9 वर्षों में गरीबी की रेखा को पार करने वालों की सख्या 13.5 करोड़ है। इसी बीच में 15 जनवरी 2024 को प्रेस इनफार्मेशन ब्यूरो ने एक प्रेस रिलीज़ कर जानकारी दी कि पिछले 9 वर्षों में 24.82 लोगों ने अत्यधिक गरीबी की सीमा को पार कर लिया है। अब तो, पूरी दिल्ली में इसके पोस्टर भी लग गए हैं| पीआईबी के प्रेस रिलीज़ का स्त्रोत नीति आयोग का एक डिस्कशन पेपर, मल्टीडाईमेंशनल पावर्टी इन इंडिया सिंस 2005-2006, है।
नीति आयोग की इस रिपोर्ट को इसके सदस्य प्रोफ़ेसर रमेश चन्द और वरिष्ठ सलाहकार डॉ योगेश सूरी ने तैयार किया है। इस रिपोर्ट में स्पष्ट तौर पर यह भी लिखा है कि “यह इसके लेखकों के निजी विचार हैं”। जाहिर है, इस रिपोर्ट का कोई महत्व नहीं है क्योंकि आज के दौर में सरकार से जुड़े हरेक अधिकारी के निजी विचार केवल अपने आका को खुश करना है। यह रिपोर्ट भी इसी नीयत से बनाई गयी है और गरीबी जैसे गंभीर विषय पर इससे फूहड़ कोई रिपोर्ट हो ही नहीं सकती। इस रिपोर्ट में सुविधानुसार कहीं भी आबादी का प्रतिशत तो कहीं आबादी की संख्या का समावेश किया गया है। इस रिपोर्ट को लिखने वालों की मानसिक स्थिति का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि इसमें टेबल 1 का शीर्षक है – स्टेटवाइज पावर्टी एस्टिमेट्स इन लास्ट 9 इयर्स (2013-14 टू 2022-23) – और यह टेबल वर्ष 2005-06 के आंकड़े भी बताती है।
इस रिपोर्ट के अनुसार पिछले 9 वर्षों के दौरान 24.8 करोड़ लोग अत्यधिक गरीबी से बाहर आ चुके हैं। लेखको के निजी विचारों वाले रिपोर्ट के आंकड़ों से इतना तो स्पष्ट है कि मनमोहन सिंह सरकार कम से कम गरीबी उन्मूलन के सन्दर्भ में मोदी सरकार से बेहतर थी, जिसने 10 वर्षों में 28 करोड़ लोगों को गरीबी रेखा से बाहर निकाला था। मनमोहन सिंह सरकार कम से कम समाज के आख़िरी वर्ग तक पहुँचती थी। दूसरा तथ्य यह है कि 5 वर्षों में 13.5 करोड़ लोगों को गरीबी रेखा से बाहर करने वाली मोदी सरकार 9 वर्षों में 24.8 करोड़ लोगों को अत्यधिक गरीबी से बाहर निकाल पाई – यानि पिछले 9 वर्षों में सबसे अंतिम आदमी तक पहुँचने के दावों और प्रचार के बाद भी कम से कम इस क्षेत्र में कोई तेजी नहीं आई। इस रिपोर्ट में माना गया है कि देश की आबादी 2005-2006 के बाद से बढ़ी ही नहीं है।

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