विश्व खुशी दिवस पर “सुख-शांति भवन” में खुशियों का उत्सव

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सादर प्रकाशनार्थ

 

*विश्व खुशी दिवस पर “सुख-शांति भवन” में खुशियों का उत्सव*

 

*खुशी बांटने से बढ़ती है*

 

*“खुशी संक्रामक है”- बीके नीता*

 

नीलबड़ स्थित सुख-शांति भवन मेडिटेशन रिट्रीट सेंटर में विश्व खुशी दिवस के उपलक्ष्य में एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में भाई-बहनों एवं स्थानीय नागरिकों ने सहभागिता की। कार्यक्रम का उद्देश्य लोगों को खुशी के वास्तविक स्वरूप, उसके विज्ञान तथा जीवन में उसकी आवश्यकता के प्रति जागरूक करना रहा।

कार्यक्रम के दौरान विभिन्न रोचक गतिविधियों के माध्यम से प्रतिभागियों को यह अनुभव कराया गया कि खुशी बाहरी वस्तुओं या परिस्थितियों पर निर्भर नहीं होती, बल्कि यह हमारे विचारों, दृष्टिकोण और आंतरिक स्थिति पर आधारित होती है। सभी ने एक-दूसरे को शुभकामनाएँ दीं और जीवन में निरंतर खुश रहने की दुआएँ दीं, जिससे वातावरण अत्यंत सकारात्मक एवं आनंदमय बन गया।

इस अवसर पर वरिष्ठ राजयोगी भ्राता रामकुमार जी ने अपने उद्बोधन में कहा कि सच्ची खुशी आत्मा की मूल अवस्था है, जिसे हम बाहरी आकर्षणों में खोजते हुए स्वयं से दूर हो जाते हैं। उन्होंने बताया कि जब हम अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानते हैं, तब स्थायी सुख और शांति का अनुभव संभव होता है।

ब्रह्माकुमारी दुर्गा दीदी (आर्किटेक्ट) ने “खुशी का विज्ञान” विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सकारात्मक विचार न केवल मन को शांति प्रदान करते हैं, बल्कि शरीर को भी स्वस्थ बनाते हैं। उन्होंने समझाया कि खुशी एक ऊर्जा है, जो हमारे संबंधों को मधुर और सशक्त बनाती है।

सुख शांति भवन की निदेशिका वरिष्ठ राजयोगिनी आदरणीय बीके नीता दीदी ने कहा कि आज के समय में लोग उपलब्धियों के पीछे भागते हुए खुशी को खो देते हैं, जबकि वास्तविक खुशी संतोष, आत्म-स्वीकार और परमात्म स्मृति में निहित है। उन्होंने सभी को आंतरिक शांति के माध्यम से स्थायी आनंद प्राप्त करने का मार्ग बताया।एवं कहा खुशी संक्रामक है।जितना हम खुश रहेंगे दूसरों को वह खुशी स्वतः ही प्राप्त होती है।

ब्रह्माकुमारी हेमा बहन ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि जब हम दूसरों को खुशी देने का संकल्प लेते हैं, तभी हम सच्ची खुशी का अनुभव करते हैं। उन्होंने बताया कि आपसी विश्वास, सहयोग और प्रेम से ही संबंध मजबूत बनते हैं और जीवन में स्थायी आनंद आता है।

कार्यक्रम के दौरान बीके सोनम बहन द्वारा राजयोग ध्यान का अभ्यास भी कराया गया, जिसमें सभी ने गहन शांति और आत्मिक शक्ति का अनुभव किया। उन्होंने बताया कि नियमित ध्यान से मन शांत होता है, तनाव कम होता है, नींद बेहतर होती है और आत्मा अपने मूल गुणों—शांति, प्रेम और आनंद—का अनुभव करने लगती है।

कार्यक्रम में यह भी बताया गया कि खुशी वास्तव में अंदर की अवस्था है, बाहरी वस्तु नहीं। जब आत्मा अपने सच्चे स्वरूप में स्थित होती है, तो बिना किसी कारण भी खुशी का अनुभव होता है। साथ ही यह संदेश दिया गया कि खुशी का संबंध लेने से नहीं, बल्कि देने से है—जितना हम दूसरों को शुभ भावना, सम्मान और सहयोग देते हैं, उतनी ही हमारी खुशी बढ़ती है। राजयोग मेडिटेशन के माध्यम से परमात्मा से जुड़कर आत्मा में शांति, प्रेम और आनंद की शक्तियाँ भरती हैं, जो स्थायी खुशी का आधार बनती हैं।

सभीं को “हैप्पीनेस सर्कल” गतिविधि भी कराई गई, जिसमें सभी ने एक सर्कल बनाकर एक-दूसरे की विशेषताएँ साझा कीं और कुछ क्षण उन गुणों को अनुभव किया। इस गतिविधि ने आत्म-सम्मान बढ़ाने के साथ-साथ आपसी प्रेम और सकारात्मकता को भी सुदृढ़ किया।

वक्ताओं ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि “खुशी से ही स्वास्थ्य और स्वास्थ्य ही सच्चा धन है।” प्रसन्न मन से शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जिससे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, तनाव कम होता है और जीवन संतुलित बनता है। खुश रहने वाला व्यक्ति न केवल स्वयं स्वस्थ रहता है, बल्कि समाज में भी सकारात्मक वातावरण का निर्माण करता है।

अंत में सभी ने यह संकल्प लिया कि वे हर परिस्थिति में सकारात्मक रहकर स्वयं भी खुश रहेंगे और दूसरों के जीवन में भी खुशी का संचार करेंगे। इस प्रकार यह आयोजन न केवल एक उत्सव रहा, बल्कि जीवन जीने की एक प्रेरणादायक कला सिखाने वाला अनुभव भी बना।

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