नेताओं के राजशाही जलवे

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नेताओं के राजशाही जलवे

जो खुद को जनप्रतिनिधि कहते है और जनता जिनको अपना नेता समझती है, आज कल उनके जलवे हैं, राजा महाराजाओं की तरह रहने वाले, अपने साथ 2 -4 केमरामेन रख कर चलने वाले, देश की गरीब जनता के वोटों पर अय्याशी के महलों में जनता दरबार लगाने वाले ये राजनीति के थोक व्यापारी लाखों रुपए की सरकारी गाड़ियों में शहंशाहों की तरह घूमते हैं, सरकारी ड्रायवर के साथ लाखों रुपए महीने पाने वाले 3 सरकारी अधिकारी चलते हैं , आगे पायलट गाड़ी चलती है जिसमें जनता के टैक्स के पैसों तनख्वाह पा रहे सरकारी पुलिस के 3 – 4 जवान चलते हैं, शहर के पॉश इलाकों में दसों करोड़ के सरकारी आवास में रहते हैं और इससे भी इनका शाही अंदाज नहीं बदलता, 10 – 20 हजार वर्ग फीट के मकानों को ये अकबर बादशाह के महलों की तरह सजाते हैं , सैकड़ो करोड़ रुपया लगा के सरकारी मकानों का कायाकल्प करते हैं , दर्जनों सरकारी लोगों का स्टाफ होता है जो इनकी जी हुजूरी और सेवा में तत्पर रहता है I कभी कभी ये अपने सरकारी अकबरनुमा महल से निकल कर तेल चुपड़ के गमछा डाल के प्रकट होते हैं और जनता से संवाद करने की कोशिश करते हैं, लोकतंत्र में ऐसा नजारा दिखायी देता है कि जैसे
अकबर महान जिंदा होता तो अपने दुर्भाग्य पर रोता !

आजकल मंत्री नेता मंदिर भी पूरे अहंकार और अकड़ में अपने लाव लश्कर के साथ जाते हैं और मंदिर के पुजारी भी कमर झुका के उनको गर्भगृह तक विनम्रता पूर्वक ले जाते हैं, दूसरी ओर आम भक्त हैरान – परेशान कभी खुद को कभी महाकाल को देखते हैं ? यहां तक कि महाकाल के अनन्य भक्त, जिन्होंने आदि शंकराचार्य के निर्वाण षट्कम को समझा है, जिया है वो भी हिंदुस्तान में राजशाही के पुनर्जन्म को देखकर हैरान हैं ! निर्वाण षट्कम आदमी के अहंकार को नष्ट कर आत्मज्ञान से परिचित कराता है लेकिन महाकाल के मंदिर में घुसते समय नेता के हावभाव ऐसे होते हैं जैसे उन्होंने मंदिर आकर प्रभु पर एहसान किया हो I मंदिर से बाहर निकलते हैं तो चाटुकार , फर्जी पत्रकार उन्हें घेर लेते हैं, जैसे नेता की बाईट मिल जायेगी तो शायद उनकी नौकरी बच जायेगी ? जिस जनता के वोट ने नेता जी को लोकतांत्रिक देश में जनता सेवा के लिये किसी पद पर पहुंचाया हो , पर जनता तो महाकाल के दर्शन के लिये पिट रही है, जनता को तो पंडितों द्वारा लूटा जा रहा है I

जब नेता मंदिर से बाहर निकलता है तो उनका स्टाफ सोशल मीडिया पर फोटो डालता है कि नेता जी ने आज महाकाल के दर्शन कर प्रदेश की जनता की खुशहाली के लिये प्रार्थना की , मजाक की भी हद होती है ? सच तो ये है कि जनप्रतिनिधि बनते ही महाकाल की कृपा सिर्फ नेताओ के लिये आरक्षित हो जाती है, स्कूल शिक्षा मंत्री जब महाकाल जाता है तो पूरे प्रदेश में उसके और उसके रिश्तेदारों के प्राइवेट पब्लिक स्कूल खुल जाते और गरीबों के सरकारी स्कूल बंद होने लगते हैं ? ऐसे ही खनिज मंत्री की खदानें कुकुरमुत्ते की तरह प्रदेश में बिखर जाती हैं ? और जनता को पर्यावरण खराब होने से हर सांस के साथ जहरीली हवा पीने को मजबूर होना पड़ता है ! नगरीय प्रशासन मंत्री पर तो महाकाल की विशेष कृपा होती है ! अरबों का बजट होता है और नेता जी की संपत्ति में हर टैंडर के साथ इजाफा होता रहता है, लेकर जनता जहरीला गंदा पानी पी कर बेमौत मर रही है I स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा मंत्री के बेनामी अस्पताल खुल जाते हैं, मेडिकल कॉलेज खुल जाते हैं और जनता को इन अस्पतालों में लूटा जाता है, इनके प्राइवेट कॉलेजों से निकलकर रिश्वतखोरों के पैसे वाले गधों को डॉक्टर बनाया जाता है और जनता इनसे इलाज कराने को मजबूर हैं ?

ये नेता जहां तहां 10 चमचों और 2 – 4 केमरामेन के साथ कलफ किया हुआ कुर्ता और दुपट्टा पहने कथा में पहुँच जाते हैं , मंदिर की स्थापना में पहुँच जाते हैं, भोले बाबा की बारात में पहुँच जाते हैं, किसी पाखंडी बाबा के आश्रम पहुंचकर उसके सामने दंडवत हो जाते हैं, अंधविश्वास फैलाते हैं, शादियों में पहुँच जाते हैं और उनके गुर्गे सब कुछ फेसबुक में डाल देते हैं कि आज मंत्री जी ने फलां की शादी में शिरकत कर सौ.का. उषा और चिर. कमल को आशीर्वाद दिया I कभी इनको इंदौर के भागीरथपुरा में मारे गये निर्दोष गरीब परिवारों से मिलते हुए देखा ? छिंदवाड़ा के मासूम बच्चों की मौत के बाद इनके मुंह से असल सांत्वना के शब्द या कार्य सुने ? पुल टूट रहे हैं, बच्चों को कुत्ते कुतर रहे हैं, पटाखे की अवैद्य फैक्टरी में विस्फोट से लोग मर रहे हैं, सड़कों पर बस जलने से लोग मर रहे हैं लेकिन ये सिर्फ मंदिर, मस्जिद, शादी, कथा और पाखंडी बाबाओं में मस्त हैं I कभी एयरपोर्ट में किसी बड़े नेता का स्वागत करते फोटो सोशल मीडिया पर डालते हैं या दिल्ली जाकर बड़े – बड़े नेताओं के साथ मुलाकात का चित्र लगा देते हैं ? कभी किसी नेता को चुनाव के बगैर किसी जरूरत मंद को कंबल देते या वृद्धाश्रम या अनाथ आश्रम जाकर सामाजिक सरोकार के कार्यक्रम करते देखा है ?

असल बात तो ये है कि रंगमंच पर महंगे कलफ लगे कुर्ते पहनकर, शानदार पजामा पहनकर , डिसाइनर दुपट्टे लटकाकर, सिंदूरी टिका लगाकर, डाई किये हुए मूंछ – बाल सजा के एक नियोजित नाटक का रोज मंचन किया जाता है, मूर्छित जनता कभी धर्म, कभी पाखंडी बाबाओं, कभी कथा वाचकों के प्रपंचों के चलते रोज धोख़ा खाती है लेकिन पर्दे के पीछे सब कुछ स्याह है , षड्यंत्र है, छल – कपट का माया जाल है I

नमस्कार

राजेंद्र सोनी
संपादक, लेखक , चिंतक
मुक्ति की उड़ान ( निष्पक्ष सत्य के लिये उत्कृष्ट पत्रिका ) , भोपाल
Email : muktikiudaan@gmail.com

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