पटवारी, तहसीलदार और एसडीएम की कृपा से भू-माफियाओं की चांदी?

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*पटवारी, तहसीलदार और एसडीएम की कृपा से भू-माफियाओं की चांदी?*

 

लेख -राजेन्द्र सिंह जादौन

 

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल इन दिनों एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां विकास और विनाश के बीच की रेखा लगभग मिटती हुई नजर आ रही है। एक तरफ सरकारें बड़े-बड़े मंचों से यह घोषणा करती हैं कि भू-माफियाओं पर कड़ी कार्रवाई होगी, सरकारी जमीनों को अतिक्रमण से मुक्त कराया जाएगा और अवैध कॉलोनियों पर बुलडोजर चलेगा। लेकिन दूसरी तरफ जमीन पर हकीकत यह है कि भू-माफिया पहले से ज्यादा सक्रिय हैं और उनकी चांदी कट रही है। सवाल यह उठता है कि आखिर यह सब किसके संरक्षण में हो रहा है?

 

भोपाल के नीलबड़, रातीबड़, मेंडोर-मेंडोरी, बेरखेड़ी, नाथू बरखेड़ा, गोरा बिसनखेड़ी और डीपीएस स्कूल के आसपास के इलाकों में अगर कोई जमीनी हकीकत देखने जाए, तो उसे साफ समझ आ जाएगा कि किस तरह सरकारी जमीन, नाले, तालाब और पहाड़ों पर लगातार कब्जा हो रहा है। ये कब्जे अचानक नहीं होते, बल्कि एक सुनियोजित प्रक्रिया के तहत किए जाते हैं, जिसमें बिना प्रशासनिक मिलीभगत के कुछ भी संभव नहीं है।

 

कहने को तो राजस्व विभाग के पास हर जमीन का पूरा रिकॉर्ड होता है। पटवारी के पास खसरा-खतौनी की जानकारी होती है, तहसीलदार के पास राजस्व नियंत्रण की जिम्मेदारी होती है और एसडीएम के पास प्रशासनिक शक्ति होती है। लेकिन जब यही तीनों स्तर एक साथ मौन हो जाएं या सक्रिय सहयोग देने लगें, तो फिर कानून केवल कागजों में ही सीमित रह जाता है।

 

भोपाल में इस समय “विकास” का एक नया मॉडल चल रहा है जहां पहले सरकारी जमीन खोजी जाती है, फिर धीरे-धीरे उस पर कब्जा किया जाता है, और फिर उसे वैध बनाने की प्रक्रिया शुरू होती है। पहले एक छोटा सा निर्माण होता है, फिर उसके आसपास और निर्माण जुड़ते जाते हैं, और देखते ही देखते वहां एक पूरी कॉलोनी बस जाती है।

 

सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन कॉलोनियों में प्लॉट भी खुलेआम बेचे जा रहे हैं। आम जनता, जो सस्ते प्लॉट की तलाश में होती है, वह इन जालों में फंस जाती है। बाद में जब प्रशासन कार्रवाई करता है, तो नुकसान उसी आम आदमी का होता है, जिसने अपनी जमा-पूंजी लगाकर एक छोटा सा घर बनाने का सपना देखा था। भू-माफिया और उनके संरक्षणदाता तब तक अपना काम निकाल चुके होते हैं।

 

नालों पर हो रहा अतिक्रमण एक अलग ही खतरा पैदा कर रहा है। आज जिन नालों को पाटकर कॉलोनियां बसाई जा रही हैं, वही नाले बारिश के समय पानी का रास्ता बनते हैं। जब यह रास्ता बंद हो जाता है, तो शहर में जलभराव की समस्या उत्पन्न होती है। हर साल बारिश के दौरान भोपाल में जलभराव की खबरें सामने आती हैं, लेकिन शायद ही कभी यह सवाल उठाया जाता है कि इसके पीछे असली वजह क्या है।

 

तालाबों की स्थिति भी कुछ अलग नहीं है। भोपाल, जिसे कभी “झीलों का शहर” कहा जाता था, अब धीरे-धीरे अपने जलस्रोत खोता जा रहा है। तालाबों को पाटकर प्लॉट काटे जा रहे हैं और उन पर निर्माण हो रहा है। यह केवल पर्यावरण के लिए ही नहीं, बल्कि भविष्य की जल सुरक्षा के लिए भी एक गंभीर खतरा है।

 

और फिर आता है पहाड़ों का नंबर। भोपाल के आसपास के पहाड़ी क्षेत्र, जो कभी हरियाली और प्राकृतिक संतुलन का प्रतीक थे, अब धीरे-धीरे कंक्रीट के जंगल में बदलते जा रहे हैं। पहाड़ों को काटकर वहां निर्माण किया जा रहा है, जिससे न केवल पर्यावरण को नुकसान हो रहा है, बल्कि भूस्खलन जैसी घटनाओं का खतरा भी बढ़ रहा है।

 

अब सवाल यह है कि जब यह सब इतने बड़े स्तर पर हो रहा है, तो क्या प्रशासन को इसकी जानकारी नहीं है? क्या पटवारी, तहसीलदार और एसडीएम इन गतिविधियों से अनजान हैं? या फिर यह सब उनकी “मौन सहमति” से हो रहा है?

 

जब एक आम नागरिक अपने घर में एक छोटा सा निर्माण करता है, तो उसे तुरंत नोटिस मिल जाता है। लेकिन जब भू-माफिया पूरी की पूरी कॉलोनी खड़ी कर देते हैं, तो फाइलें “प्रक्रिया में” चली जाती हैं। जांच समितियां बनती हैं, रिपोर्ट तैयार होती हैं, और फिर सब कुछ ठंडे बस्ते में चला जाता है।

 

मुख्यमंत्री और नगरीय प्रशासन मंत्री के आदेश भी शायद इन इलाकों तक पहुंचते-पहुंचते अपनी ताकत खो देते हैं। ऊपर से सख्ती के निर्देश आते हैं, लेकिन नीचे तक आते-आते उनका असर खत्म हो जाता है। और तब वही पुराना खेल शुरू हो जाता है आदेशों का “घंटा बजाना”।

 

यह स्थिति केवल प्रशासनिक विफलता नहीं है, बल्कि यह एक संगठित तंत्र की ओर इशारा करती है, जिसमें हर स्तर पर कुछ लोग लाभान्वित हो रहे हैं। भू-माफिया जमीन पर कब्जा करते हैं, अधिकारी आंखें बंद करते हैं, और अंत में आम जनता इसकी कीमत चुकाती है।

 

अगर समय रहते इस पर सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो आने वाले वर्षों में भोपाल की पहचान पूरी तरह बदल सकती है। झीलों और हरियाली के लिए जाना जाने वाला यह शहर अवैध कॉलोनियों और अव्यवस्थित विकास का प्रतीक बन सकता है।

 

जरूरत इस बात की है कि केवल बयानबाजी न हो, बल्कि जमीनी स्तर पर ईमानदारी से कार्रवाई की जाए। जिन अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध है, उनकी जांच हो, जिम्मेदारी तय की जाए और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो। साथ ही, आम जनता को भी जागरूक किया जाए कि वे अवैध कॉलोनियों में निवेश न करें।

 

यह सवाल हम सभी के सामने है क्या हम अपने शहर को बचाना चाहते हैं, या फिर चुपचाप उसे भू-माफियाओं के हवाले कर देना चाहते हैं?

 

क्योंकि अगर आज भी हम नहीं जागे, तो कल जब हर नाला एक प्लॉट बन जाएगा, हर तालाब एक मकान में बदल जाएगा और हर पहाड़ एक प्रोजेक्ट में तब्दील हो जाएगा, तब शायद पछताने के अलावा हमारे पास कुछ नहीं बचेगा

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