मध्यप्रदेश का करोड़पति आईएएस और सवाल ?*
*मध्यप्रदेश का करोड़पति आईएएस और सवाल ?*
व्यंग्य – राजेन्द्र सिंह जादौन
मध्यप्रदेश की फिजाओं में इन दिनों एक नाम तैर रहा है एक ऐसा नाम जो सत्ता के गलियारों से निकलकर अब चाय की दुकानों, व्हाट्सएप ग्रुपों और मीडिया की सुर्खियों तक पहुंच चुका है। बात एक आईएएस अधिकारी की हो रही है, जिनकी संपत्ति, पदस्थापन और पुराने किस्से अब सवालों के घेरे में खड़े नजर आ रहे हैं।
मैं यह नहीं कहता कि मेरे पास पूरी सच्चाई है, लेकिन इतना जरूर है कि इस अधिकारी को छिंदवाड़ा कलेक्टर के समय से जानता हूँ। उस समय भी चर्चाएं होती थीं, पर वो सीमित दायरे में थीं अफसरों और कुछ स्थानीय हलकों तक। अब वही चर्चाएं एक बड़े रूप में सामने आ रही हैं, जैसे किसी ने दबे हुए फाइल को अचानक खोल दिया हो।
सबसे दिलचस्प बात जो सामने आ रही है, वह है संपत्ति का तर्क। कहा जा रहा है कि इनकी संपत्ति “ब्रिटिश काल” से जुड़ी हुई है। अब यह सुनने में जितना शाही लगता है, उतना ही सवाल खड़ा करता है। क्या वाकई कोई सरकारी अधिकारी अपनी वर्तमान संपत्ति को इतने पुराने इतिहास से जोड़कर जायज ठहरा सकता है? अगर ऐसा है, तो फिर आज के कानून, आय के स्रोत और संपत्ति के नियम किसलिए बने हैं?
आम आदमी अगर अपने बैंक खाते में अचानक कुछ लाख रुपये भी दिखा दे, तो उससे दस तरह के सवाल पूछे जाते हैं इनकम टैक्स नोटिस, जांच, दस्तावेजों की मांग। लेकिन जब मामला करोड़ों का हो और वह भी एक उच्च पदस्थ अधिकारी से जुड़ा हो, तो जवाब इतिहास की धूल में ढूंढा जाता है।
भोपाल का एक नामी होटल नूर-ए-सबा भी इस पूरे घटनाक्रम में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। कहा जा रहा है कि पुराने गेस्ट रजिस्टर कई कहानियों को उजागर कर सकते हैं। अब यह बात कितनी सही है, यह तो जांच का विषय है, लेकिन पत्रकारिता का धर्म यही कहता है कि जहां शक हो, वहां खोज होनी चाहिए। मेरे पत्रकार साथियों से बस इतना कहना है कि खबर सिर्फ प्रेस नोट से नहीं बनती, कभी-कभी पुराने रजिस्टर और धूल खाए कागज भी बड़ी खबर दे जाते हैं।
यह भी एक दिलचस्प पहलू है कि जब यह अधिकारी कलेक्टर जैसे महत्वपूर्ण पद से ऊर्जा विकास निगम में पहुंचे, तो उस बदलाव के पीछे क्या कारण थे? क्या यह एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया थी या फिर इसके पीछे भी कोई कहानी छिपी हुई है? क्योंकि सिस्टम में पदों का बदलाव कभी-कभी सिर्फ ट्रांसफर नहीं होता, बल्कि एक संकेत होता है किसी बड़ी हलचल का।
अब सवाल यह उठता है कि क्या हमारी व्यवस्था इतनी कमजोर हो गई है कि वह अपने ही अधिकारियों की संपत्ति और कार्यप्रणाली पर पारदर्शिता सुनिश्चित नहीं कर सकती? या फिर यह सब कुछ जानबूझकर नजरअंदाज किया जाता है?
सबसे बड़ी विडंबना यही है कि हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं, जहां “ईमानदारी” को साबित करना पड़ता है, और “संदेह” को नजरअंदाज किया जाता है। अगर कोई अधिकारी साफ-सुथरा है, तो उसे खुद सामने आकर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। और अगर आरोपों में जरा भी सच्चाई है, तो फिर जांच एजेंसियों को बिना किसी दबाव के अपना काम करना चाहिए।
मध्यप्रदेश जैसे राज्य में, जहां विकास, निवेश और प्रशासनिक पारदर्शिता की बात की जाती है, वहां इस तरह की खबरें न सिर्फ सरकार की छवि को प्रभावित करती हैं, बल्कि आम जनता के भरोसे को भी कमजोर करती हैं। क्योंकि जनता यह मानकर चलती है कि जो लोग शासन चला रहे हैं, वे कम से कम नियमों का पालन करेंगे।
लेकिन जब वही लोग सवालों के घेरे में आते हैं, तो भरोसा दरकने लगता है। और जब भरोसा टूटता है, तो उसका असर सिर्फ एक अधिकारी या एक विभाग तक सीमित नहीं रहता पूरा सिस्टम उसकी चपेट में आ जाता है
इस पूरे मामले में सबसे जरूरी चीज है सत्य। न तो बिना सबूत किसी को दोषी ठहराया जाना चाहिए, और न ही सवालों को दबाकर सच्चाई को छिपाया जाना चाहिए। एक निष्पक्ष जांच ही इस पूरे विवाद का सही समाधान हो सकती है।
अगर सब कुछ सही है, तो यह जांच उस अधिकारी के लिए एक क्लीन चिट साबित होगी। और अगर कुछ गलत है, तो वही जांच सिस्टम को यह संदेश देगी कि कानून से ऊपर कोई नहीं है चाहे वह कितना ही बड़ा पद क्यों न रखता हो।
बात सिर्फ एक अधिकारी की नहीं है। यह सवाल है उस व्यवस्था का, जिसमें हम जी रहे हैं। यह सवाल है उस पारदर्शिता का, जिसकी हम उम्मीद करते हैं। और यह सवाल है उस जिम्मेदारी का, जो हर सरकारी अधिकारी के कंधों पर होती है।
क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ी ताकत जनता होती है, और जनता अब सिर्फ सुनती नहीं पूछती भी है।
बाकी…
रामजी की मर्जी।
