रोड़ पर चालान और नेताओं को सलाम वाली पुलिस की मध्यप्रदेश में कानून व्यवस्था भी विकास की पुल-पुलिया और सड़क जैसी ?

रोड़ पर चालान और नेताओं को सलाम वाली पुलिस की मध्यप्रदेश में कानून व्यवस्था भी विकास की पुल-पुलिया और सड़क जैसी ?
व्यंग्य – राजेन्द्र सिंह जादौन
भोपाल की सड़कों पर अगर आप हेलमेट के बिना निकल जाएं तो पुलिस आपको ऐसे ढूंढ लेती है जैसे पुरातत्व विभाग कोई प्राचीन खजाना खोज रहा हो। लेकिन अगर कोई बदमाश खुलेआम धमकी देता घूम जाए, तो वही पुलिस दूरबीन उल्टी पकड़कर देखती नजर आती है। यह विरोधाभास अब व्यवस्था का हिस्सा बन चुका है जहां कानून आम आदमी के लिए सख्त और रसूखदारों के लिए लचीला रबर बन चुका है।
हाल ही में राजधानी में एडीजी (ट्रेनिंग) जैसे वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी के घर तक बदमाशों का पहुंच जाना और धमकी देना केवल एक घटना नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की पोल खोल देने वाली कहानी है। जब वर्दी के सितारे ही अपने घरों में सुरक्षित नहीं हैं, तो आम आदमी की सुरक्षा का अनुमान आप खुद लगा लीजिए। लगता है अब अपराधियों ने भी यह समझ लिया है कि डरने का नहीं, डराने का जमाना है।
मध्यप्रदेश में कानून व्यवस्था अब विकास की सड़कों जैसी हो गई है ऊपर से चिकनी-चुपड़ी, लेकिन अंदर से खोखली। जैसे बरसात आते ही पुलिया बह जाती है, वैसे ही एक घटना आते ही कानून व्यवस्था बह जाती है। फर्क सिर्फ इतना है कि पुलिया पर जांच कमेटी बनती है और कानून व्यवस्था पर बयानबाजी।
यहां पुलिस की प्राथमिकता भी बड़ी स्पष्ट है जहां कैमरा हो, वहां चालान; जहां नेता हो, वहां सलाम; और जहां अपराधी हो, वहां आराम। ट्रैफिक चौराहों पर पुलिस की सक्रियता देखकर लगता है कि पूरा विभाग यातायात सुधारने में ही लगा है, मानो अपराध नाम की कोई चीज बची ही न हो। लेकिन जैसे ही कोई बड़ी घटना होती है, वही पुलिस ‘जांच जारी है’ का पोस्टर लेकर खड़ी हो जाती है।
गृह विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना स्वाभाविक है। आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी है कि अपराधियों के हौसले लगातार बुलंद होते जा रहे हैं? क्या कानून का डर अब केवल पोस्टरों और विज्ञापनों तक सीमित रह गया है? या फिर कानून भी अब वीआईपी और आम आदमी के हिसाब से अलग-अलग लागू होता है?
नेताओं के काफिले गुजरते हैं तो पुलिस की मुस्तैदी देखने लायक होती है सड़कें खाली, ट्रैफिक बंद, और सलाम की लाइनें तैयार। लेकिन उसी सड़क पर कोई आम नागरिक लूट जाए, तो वही पुलिस कागजों में दौड़ती नजर आती है। ऐसा लगता है जैसे पुलिस का असली काम सुरक्षा नहीं, बल्कि व्यवस्था का “प्रबंधन” बन गया है जहां व्यवस्था का मतलब है सत्ता की सुविधा।
मज़ाक की बात यह है कि हर घटना के बाद बयान आता है “दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।” लेकिन दोषी भी शायद यह बयान सुनकर मुस्कुरा देते होंगे, क्योंकि उन्हें पता है कि बख्शा नहीं जाएगा का मतलब होता है फाइल खुलेगी, घूमेगी, और फिर कहीं अलमारी में सो जाएगी।
अब सवाल यह नहीं है कि अपराध बढ़ रहे हैं या नहीं, सवाल यह है कि क्या व्यवस्था उन्हें रोकना चाहती भी है या नहीं? जब एक वरिष्ठ अधिकारी तक सुरक्षित नहीं, तो यह मान लेना चाहिए कि व्यवस्था का संतुलन कहीं न कहीं बिगड़ चुका है। और जब संतुलन बिगड़ता है, तो सबसे पहले आम आदमी ही दबता है।
कानून व्यवस्था की तुलना अगर सड़कों से की जाए, तो यहां गड्ढे ही गड्ढे नजर आते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि सड़कों के गड्ढे दिखाई देते हैं और कानून व्यवस्था के गड्ढे छुपे रहते हैं जब तक कोई उसमें गिर न जाए।
आखिर में सवाल यही है क्या पुलिस का काम सिर्फ चालान काटना और सलाम ठोकना रह गया है? या फिर कभी वह दिन भी आएगा जब अपराधी पुलिस से डरेंगे, न कि पुलिस अपराधियों से?
जब तक इस सवाल का जवाब नहीं मिलता, तब तक यह हकीकत ही समझिए जहां कानून व्यवस्था भी विकास की उन पुल-पुलियों जैसी है, जो बनने से ज्यादा टूटने के लिए जानी जाती
