पत्रकार को सवाल पूछने से रोकना लोकतांत्रिक दृष्टि से चिंताजनक है या अपमानजनक?

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*क्‍या संकेत देता है मुख्‍यमंत्री का पत्रकारों के सवालों से डरना?*

 

*पत्रकार को सवाल पूछने से रोकना लोकतांत्रिक दृष्टि से चिंताजनक है या अपमानजनक?*

 

*सवालों से डरती सत्ता या सवालों से मजबूत होता लोकतंत्र*

 

*जब सरकार सवाल चुनती है और लोकतंत्र हारता है*

 

*प्रेस की आज़ादी कोई एहसान नहीं, संविधान का अधिकार है*

 

*संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रेस की आज़ादी को मूल अधिकार का दर्जा प्राप्त*

 

*अटल बिहारी वाजपेयी समझते थे पत्रकारिता की अह‍मियत*

 

*विजया पाठक, एडिटर, जगत विजन*

भारतीय लोकतंत्र में मीडिया को अक्सर चौथे स्तम्भ के रूप में परिभाषित किया जाता है। यह केवल खबरों का स्रोत नहीं है, बल्कि यह सरकार और शासन की गतिविधियों पर निगरानी रखने वाला एक महत्वपूर्ण अंग है। इतिहास हमें यह सिखाता है कि लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब मीडिया स्वतंत्र हो और निष्पक्षता के साथ सच्चाई को उजागर करने का अधिकार रखता हो। पिछले कुछ वर्षों में यह देखा गया है कि मीडिया के प्रति व्यवहार और प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने के तरीके, लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए गंभीर चुनौती पेश करते हैं। उदाहरण के लिए, मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सरकार के तहत प्रेस कॉन्फ्रेंस में मीडिया के सवाल पूछने की स्वतंत्रता पर रोक लगाने जैसी घटनाएं सामने आई हैं। कुछ चुनिंदा पत्रकारों को ही प्रश्न पूछने का अवसर मिलता है। लोकतांत्रिक दृष्टि से यह चिंताजनक और अपमानजनक है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में आयोजकों द्वारा चुनिंदा पत्रकारों से ही सवाल कराए जाने की प्रवृत्ति पर एक बार फिर गंभीर बहस छिड़ गई है। जानकारों का कहना है कि निजी आयोजनों में सवालों का चयन आयोजक की मर्जी से होना भले ही स्वीकार्य हो, लेकिन जब प्रेस कॉन्फ्रेंस किसी सरकारी अधिकारी, जिला प्रशासन, पुलिस, मंत्री या सरकारी विभाग की हो, तब सवालों को सीमित करना लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है। मीडिया विशेषज्ञों का कहना है कि प्रेस कॉन्फ्रेंस कोई निजी मंच नहीं, बल्कि जनता के प्रति जवाबदेही का माध्यम होती है। यहां पूछे जाने वाले सवाल सरकार या प्रशासन की पारदर्शिता की कसौटी होते हैं। यदि कठिन या असहज सवालों से बचा जाए तो यह संदेश जाता है कि सत्ता संवाद नहीं, केवल प्रचार चाहती है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सवाल यह उठ रहा है कि क्या सरकारी प्रेस कॉन्फ्रेंस अब संवाद का मंच रहेंगी या केवल नियंत्रित संदेश देने का जरिया बनकर रह जाएंगी। अगर सत्ता सवालों को सीमित करेगी तो नुकसान सिर्फ पत्रकारों का नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा का होगा। मीडिया और लोकतंत्र के इस रिश्ते में एक बात साफ है जो सरकार सवालों का सम्मान करती है, वही वास्तव में लोकतंत्र का सम्मान करती है। कानूनी जानकार मानते हैं कि प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवालों को सीमित करना सीधे तौर पर कोई दंडनीय अपराध नहीं है, लेकिन यह लोकतांत्रिक परंपराओं के खिलाफ जरूर है। लोकतंत्र में सरकार की मजबूती सवालों से नहीं, उनके जवाब देने की क्षमता से तय होती है। सरकारी प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवालों की आज़ादी केवल पत्रकारों का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र की सेहत से जुड़ा प्रश्न है। अगर सवाल सीमित होंगे, तो जवाबदेही भी सीमित हो जाएगी। लोकतंत्र में मजबूत वही सरकार मानी जाती है जो सवालों का सामना करती है, न कि उनसे बचती है। संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रेस की आज़ादी को मूल अधिकार का दर्जा प्राप्त है।

 

*जब सवाल ही नहीं पूछने देंगे तो ऐसी पत्रकार वार्ता का क्‍या मतलब?*

मैंने मुख्‍यमंत्री की अनेकों पत्रकार वार्ता में भाग लिया है। लेकिन इन पत्रकार वार्ता में केवल कुछ चुनिंदा पत्रकारों को ही सवाल पूछने की इजाजत मिलती है। मुझे हर बार सवाल पूछने से रोका जाता रहा है। क्‍योंकि मेरे सवाल सरकार के पक्ष में नहीं बल्कि सरकार की नीति और नीयत पर होते हैं। सच्‍चाई पर होते हैं। शायद यह सवाल सरकार को पसंद नहीं आते होंगे। मेरा सवाल है कि जब सवाल पूछने की आजादी ही नहीं होती है तो ऐसी पत्रकार वार्ता करने का क्‍या मतलब है? इससे अच्‍छा तो एक प्रेस विज्ञप्ति बनवाये और सभी जगह भिजवा दे, जिसे छापना होगा छापेंगे नहीं तो रद्दी की टोकरी में डाल देंगे।

 

*अटल बिहारी वाजपेयी जानते थे पत्रकारवार्ता का मतलब*

इतिहास में हमें ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं जब प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री मीडिया से खुले और ईमानदार संवाद करते रहे। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। वाजपेयी न केवल कुशल वक्ता थे, बल्कि प्रेस की स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक भी थे। उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस में हमेशा साफ देखा गया कि वे कठिन और असहज सवालों से नहीं भागते थे, सवाल पूछने वाले पत्रकार को अपमानित नहीं करते थे और आलोचनात्मक प्रश्नों को लोकतंत्र की ताकत मानते थे। वाजपेयी का एक प्रसिद्ध जवाब है जब उनसे पूछा गया कि “आप अब तक कुंवारे क्यों हैं?” उन्होंने जवाब दिया, “मैं कुंवारा नहीं हूँ, अविवाहित हूँ।” उनके लहजे की शालीनता और तर्कसंगत दृष्टिकोण ने उन्हें न केवल जनता के बीच बल्कि मीडिया के बीच भी बेहद लोकप्रिय बनाया। इसी तरह, मनमोहन सिंह, पी. चिदंबरम, ज्योति बसु, शरद पवार, सुषमा स्‍वराज, राहुल गांधी और छत्‍तीसगढ़ के मुख्‍यमंत्री विष्‍णुदेव साय, अरविंद केजरीवाल, सुब्रमणियम स्‍वामी अन्य नेताओं ने भी प्रेस के सवालों का स्वागत किया और लोकतंत्र की इस मजबूत रीढ़ को बनाए रखा।

 

*मीडिया का सम्मान लोकतंत्र की मजबूती का संकेत*

प्रेस कॉन्फ्रेंस जनता के प्रति जवाबदेही का मंच होती है। यहां सवालों का चयन नहीं, बल्कि खुला संवाद अपेक्षित होता है। जब प्रेस कॉन्फ्रेंस संवाद की जगह प्रचार का माध्यम बन जाती है, तो जनता का भरोसा कमजोर होता है। मीडिया का काम सिर्फ संदेश आगे बढ़ाना नहीं, बल्कि सत्ता से सवाल पूछना भी है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवालों की आज़ादी केवल पत्रकारों का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र की सेहत से जुड़ा प्रश्न है। अगर सवाल सीमित होंगे, तो जवाबदेही भी सीमित हो जाएगी। लोकतंत्र में मजबूत वही सरकार मानी जाती है जो सवालों का सामना करती है, न कि उनसे बचती है। प्रेस की आज़ादी कोई सुविधा नहीं, बल्कि संविधान द्वारा दिया गया अधिकार है और उसका सम्मान करना सत्ता की जिम्मेदारी है। सवाल पूछना अपराध नहीं है, संवैधानिक अधिकार है।

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