ये शिव सत्ता नहीं, ये मोहन दरबार है?
*ये शिव सत्ता नहीं, ये मोहन दरबार है?*
व्यंग्य – राजेन्द्र सिंह जादौन
कभी सत्ता को सेवा कहा जाता था, अब उसे शाही शौक़ कहा जाने लगा है। शिव राज में जनता के लिए द्वार खुले थे कम से कम प्रतीक में ही सही। वहाँ “दरबार” नहीं था, वहाँ दफ्तर था; वहाँ “शाही प्रवेश” नहीं, आवेदन की रसीद थी। फरियादी आता था, अपनी पीड़ा रखता था और उम्मीद लेकर लौटता था कि कहीं न कहीं न्याय की चौखट पर सुनवाई होगी। तब कहा जाता था शिव न्याय करते हैं, इसलिए फाइलें चलती हैं, बाबू हिलते हैं और कुर्सियाँ सरकती हैं।
अब दृश्य बदला हुआ है। अब यह सत्ता नहीं, मोहन दरबार है। यहाँ द्वार हैं, पर जनता के लिए नहीं; यहाँ गलियारे हैं, पर सवालों के लिए नहीं; यहाँ रोशनियाँ हैं, पर सच के लिए नहीं। यह शाही दरवाज़ा है जो राजशादियों, राजभोजों और राजसी मुस्कानों के लिए खुलता है। आम आदमी? वह तो बाहर खड़ा है हाथ में आवेदन, आँखों में उम्मीद और जेब में धैर्य की आख़िरी सिक्के।
शिव राज में “जनता दर्शन” एक शब्द था, अब “उड़ान” एक आदत है। बाबूजी को उड़ान भरने से फुर्सत कहाँ? कभी दिल्ली, कभी दुबई, कभी दावोस आसमान में योजनाएँ उड़ती हैं और ज़मीन पर शिकायतें रेंगती हैं। जनता सवाल लेकर आती है तो मोहन बाबू शीर्षासन लगा लेते हैं। शायद इसलिए कि यहाँ सब कुछ उल्टा है नीति उल्टी, प्राथमिकताएँ उल्टी, जवाबदेही उल्टी। चमगादड़ों की दुनिया में सीधे देखने के लिए उल्टा होना ज़रूरी है।
दरबार की एक खास पहचान होती है यहाँ सत्य धीरे बोलता है और चापलूसी तेज़। यहाँ फ़ाइलें चलती नहीं, चलवाई जाती हैं। यहाँ निर्णय होते नहीं, घोषित किए जाते हैं। यहाँ सवाल पूछना अपराध नहीं तो असुविधा ज़रूर है। और असुविधा से बचने के लिए सबसे आसान उपाय है मौन। मौन इतना गहरा कि उसमें जनता की आवाज़ डूब जाए और ताली-थाली की गूँज तैरती रहे।
शिव राज में बाबू जनता से डरते थे कम से कम इतना कि काम टालने से पहले दो बार सोचें। मोहन दरबार में बाबू जनता को जानते हैं इतना कि टालने के लिए सौ बहाने तैयार रखें। “कमेटी बन जाएगी”, “जांच बैठेगी”, “प्रक्रिया चल रही है” ये वाक्य अब जवाब नहीं, शिलालेख हैं। इन पर तारीख़ें नहीं बदलतीं, बस धूल जमती है।
यह दरबार उपलब्धियों की दीवारें बनाता है और असफलताओं पर परदे टाँग देता है। पोस्टर चमकते हैं, आँकड़े मुस्कराते हैं, प्रेस विज्ञप्तियाँ उड़ान भरती हैं। पर गाँव की सड़क वही है, अस्पताल की लाइन वही, स्कूल की छत वही। जनता पूछती है “हमारे हिस्से का विकास कहाँ?” दरबार कहता है “आपका सवाल प्रक्रिया में है।”
यहाँ न्याय का तराज़ू भी शाही है कभी झुकता है, कभी सजता है। जिनके पास पहुँच है, उनके लिए समय छोटा है; जिनके पास सिर्फ़ पीड़ा है, उनके लिए समय अनंत। और जो बोलने की ज़िद करते हैं, उन्हें बताया जाता है कि “आप नकारात्मक हैं।” दरबार में सकारात्मक वही है जो ताली बजाए, नकारात्मक वही है जो सवाल उठाए।
शिव राज में सत्ता ज़मीन पर उतरती थी कभी-कभी ही सही। मोहन दरबार में सत्ता मंच पर रहती है हमेशा। मंच पर भाषण हैं, नीचे इंतज़ार। मंच पर रौशनी है, नीचे अंधेरा। मंच पर प्रशंसा है, नीचे पीड़ा। और जब जनता मंच की ओर बढ़ती है, तो शाही दरवाज़ा बंद हो जाता है शांति बनाए रखने के नाम पर।
बात यह नहीं कि सत्ता बदली है; बात यह है कि सत्ता का अर्थ बदला है। सेवा से शान तक, दफ्तर से दरबार तक, जवाब से जश्न तक। सवाल वही हैं, चेहरे वही हैं, पर सुनने का साहस कम हो गया है। शायद इसलिए कि दरबार में कान सजावट के लिए होते हैं, सुनने के लिए नहीं।
आख़िर में जनता मुस्करा कर कहती है “ठीक है हुज़ूर, हम इंतज़ार करेंगे।” और दरबार संतुष्ट होकर सोचता है “देखा, सब शांत है।” पर इतिहास बताता है जब दरबार सवालों से डरने लगे, तब बदलाव दरवाज़े नहीं खटखटाता; वह दीवारें लाँघता है।
यह शिव सत्ता नहीं, मोहन दरबार है जहाँ जनता मेहमान नहीं, दर्शक है। और दर्शक देर-सबेर मंच से आँखें हटा लेता है।
