पहले आवेदन, फिर निवेदन, अब बारी है “दे धनाधन” की?

0
Spread the love

*जनसंपर्क गाथा…….*

 

*पहले आवेदन, फिर निवेदन, अब बारी है “दे धनाधन” की?*

 

*राजेन्द्र सिंह जादौन*

 

यह कोई एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, यह उस व्यवस्था की सच्चाई है जिसे जनसंपर्क कहा जाता है, लेकिन जो जनता से सबसे ज़्यादा दूर खड़ी दिखाई देती है। हमने जनसंपर्क विभाग को बीस से अधिक आवेदन दिए। दस आवेदन अलग-अलग अधिकारियों से व्यक्तिगत रूप से मिलकर सौंपे गए, दस आवेदन डाक के माध्यम से भेजे गए ताकि कोई यह न कह सके कि काग़ज़ पहुँचा ही नहीं। हर आवेदन के साथ उम्मीद जुड़ी थी कि शायद इस बार बात सुनी जाएगी, शायद इस बार किसी अधिकारी की मेज़ पर फ़ाइल खुलकर पढ़ी जाएगी। लेकिन हर बार वही नतीजा निकला खामोशी।

 

आवेदन देने के बाद जब कोई जवाब नहीं आया तो इंतज़ार किया। नियमों का पालन किया, समय दिया, प्रक्रिया को समझने की कोशिश की। लेकिन जब महीनों बीत गए और कहीं से कोई ठोस प्रतिक्रिया नहीं मिली तो हमने निवेदन का रास्ता अपनाया। सोचा, शायद विनम्रता काम कर जाए, शायद मानवीय पहलू जाग जाए। लेकिन यहाँ निवेदन भी उतना ही बेअसर साबित हुआ जितना आवेदन। हर सवाल के जवाब में एक ही वाक्य सुनने को मिला “कमिटी का गठन हो गया है” या “कमिटी बनने वाली है”

 

यह कमिटी जनसंपर्क की सबसे सुरक्षित ढाल बन चुकी है। जब भी कोई सवाल असहज होता है, जब भी किसी फ़ाइल पर निर्णय लेना पड़ता है, कमिटी सामने कर दी जाती है। कमिटी जो न दिखाई देती है, न उसकी बैठक का कोई रिकॉर्ड सार्वजनिक होता है, न उसके फैसलों की कोई समय-सीमा होती है। कमिटी यहाँ समाधान नहीं, टालने का औज़ार बन चुकी है। यह व्यवस्था का वह हिस्सा है जो जवाबदेही को मार देता है और भ्रष्टाचार को ज़िंदा रखता है।

 

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब आवेदन और निवेदन दोनों बेकार हो जाएँ, तो नागरिक क्या करे? क्या अगला चरण सचमुच “दे धनाधन” का है? क्या जनसंपर्क का मतलब यही रह गया है कि बिना चढ़ावे के कोई सुनवाई नहीं होगी? अगर ऐसा है तो फिर नियम, प्रक्रिया, पोर्टल, हेल्पलाइन और जनसुनवाई के नाम पर जो ढांचा खड़ा किया गया है, वह सिर्फ दिखावा क्यों है?

 

यह स्थिति केवल एक कार्यालय की नहीं है, यह पूरे सिस्टम की बीमारी है। यहाँ अधिकारी कुर्सी पर बैठे रहते हैं, लेकिन जनता के सवाल उन्हें परेशान नहीं करते। यहाँ फ़ाइलें चलती हैं, लेकिन न्याय नहीं चलता। यहाँ जवाब देने की ज़िम्मेदारी किसी की नहीं होती, और हर अधिकारी यह मानकर चलता है कि अगला अधिकारी देख लेगा। इसी मानसिकता ने जनसंपर्क को जन-विरोधी बना दिया है।

 

सबसे दुखद बात यह है कि यह सब खुलेआम हो रहा है। किसी को डर नहीं है, किसी को शर्म नहीं है। आवेदन दब जाए तो कोई जवाबदेह नहीं, निवेदन अनसुना रह जाए तो कोई दोषी नहीं। उल्टा सवाल पूछने वाले को ही संदेह की नज़र से देखा जाता है, जैसे उसने कोई अपराध कर दिया हो। व्यवस्था धीरे-धीरे नागरिक को ही अपराधी साबित करने में लग जाती है।

 

अब यह सवाल केवल हमारे आवेदन का नहीं रहा। यह सवाल व्यवस्था की नीयत का है। अगर जनसंपर्क विभाग जनता की बात नहीं सुनेगा, तो फिर जनता किसके पास जाएगी? अगर सरकारी तंत्र का यही चेहरा है, तो लोकतंत्र का अर्थ क्या बचता है? क्या नागरिक सिर्फ टैक्स देने, वोट डालने और चुप रहने के लिए है?

 

अब धैर्य जवाब दे चुका है। अब यह लड़ाई काउंटर और दफ्तरों की नहीं, न्यायालय की होगी। जहाँ कमिटी की आड़ नहीं चलेगी, जहाँ मौखिक आश्वासन नहीं, लिखित जवाब देना पड़ेगा। जहाँ सवाल फाइलों में नहीं, कठघरे में पूछे जाएंगे। अब वही लोग आमने-सामने होंगे जो आज खुद को नियमों के पीछे छिपा रहे हैं।

जल्द मुलाक़ात होगी अदालत में।

 

*जहाँ सब चोर एक साथ उपस्थित होंगे और जनसंपर्क की यह गाथा, सरकारी कहानी नहीं, न्यायिक दस्तावेज़ ?*

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *


Notice: ob_end_flush(): failed to send buffer of zlib output compression (0) in /home2/lokvarta/public_html/wp-includes/functions.php on line 5481