*मोहन राज में सुशासन का चमत्कार और भ्रष्टाचार का उत्सव*?*झोला छाप खबरी

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मध्यप्रदेश में सरकारें आती-जाती रहती हैं, मुख्यमंत्री बदलते रहते हैं, मगर एक चीज़ कभी नहीं बदलती सुशासन का दावा। मोहन यादव सरकार भी इसी दावे के साथ आई थी कि अब व्यवस्था सुधरेगी, भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी और जनता को राहत मिलेगी। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, दावों और हकीकत के बीच की खाई और चौड़ी होती चली गई। आज स्थिति यह है कि प्रदेश में भ्रष्टाचार कोई छुपी हुई बीमारी नहीं, बल्कि एक खुला रहस्य बन चुका है, जिसे सब जानते हैं, सब सहते हैं और सरकार “कार्रवाई जारी है” कहकर आगे बढ़ जाती है।

 

लोकायुक्त के ट्रैप केस अगर इस सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि बन गए हैं, तो यह उपलब्धि नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। हर साल सैकड़ों अधिकारी-कर्मचारी रिश्वत लेते पकड़े जा रहे हैं और सरकार इसे अपनी सक्रियता का प्रमाण बताती है। सवाल यह नहीं है कि ट्रैप हुए या नहीं हुए, सवाल यह है कि अगर हर साल औसतन दो सौ से ढाई सौ लोग रंगे हाथ पकड़े जा रहे हैं, तो क्या इसका मतलब यह नहीं कि पूरा सिस्टम ही रिश्वत को सामान्य मान चुका है। अगर डर होता, अगर सजा निश्चित होती, तो ये आंकड़े हर साल बढ़ने की बजाय घटते। लेकिन यहां तो हाल यह है कि 2022 में लगभग तीन सौ ट्रैप केस हुए, 2023 में थोड़ी गिरावट आई, फिर 2024 और 2025 में संख्या दोबारा ऊपर चढ़ गई। यानी भ्रष्टाचार कभी डाउन हुआ, कभी अप हुआ, लेकिन आउट कभी नहीं हुआ।

 

राजस्व विभाग इस कहानी का स्थायी पात्र है। पटवारी और तहसीलदार जैसे पद अब प्रशासनिक जिम्मेदारी से ज्यादा “कमाई की संभावनाओं” के लिए पहचाने जाने लगे हैं। पंचायत और ग्रामीण विकास विभाग में सरपंच और सचिव जनता की सेवा से ज्यादा सौदेबाजी के लिए बदनाम हैं। पुलिस, परिवहन, शिक्षा, स्वास्थ्य और पीडब्ल्यूडी हर वह विभाग, जहां आम आदमी का सीधा वास्ता पड़ता है, भ्रष्टाचार की खबरों में बार-बार लौटता है। यह कोई संयोग नहीं, बल्कि उस संरचना का परिणाम है, जिसमें अधिकार है, जवाबदेही नहीं; शक्ति है, डर नहीं।

 

मोहन सरकार के समर्थक अक्सर कहते हैं कि लोकायुक्त की कार्रवाई यह साबित करती है कि सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त है। लेकिन अगर गहराई से देखा जाए, तो लोकायुक्त की ट्रैप कार्रवाई सरकार की सफलता से ज्यादा उसकी विफलता को उजागर करती है। ट्रैप तब लगता है जब रिश्वत खुलेआम ली जा रही हो, जब अधिकारी को यह भरोसा हो कि पकड़े जाने के बाद भी उसका कुछ खास नहीं बिगड़ेगा। असली सवाल ट्रैप के बाद का है, और यहीं से व्यंग्य शुरू होता है।

 

ट्रैप के बाद विभागीय जांच होती है। कागज़ों में यह जांच बहुत सख्त और प्रभावी दिखती है। वास्तविकता में यह जांच एक ऐसे अनंत रास्ते पर चल पड़ती है, जहां मंज़िल से ज्यादा यात्रा लंबी होती है। फाइलें एक टेबल से दूसरी टेबल तक जाती हैं, नोटशीट पर तारीखें बढ़ती जाती हैं और आरोपी अधिकारी निलंबन की रस्म अदा कर फिर से प्रभावशाली स्थिति में लौट आता है। कई बार तो जांच पूरी होने से पहले ही अधिकारी सेवानिवृत्त हो जाता है और मामला पेंशन नियमों की पेचीदगियों में उलझकर दम तोड़ देता है।

 

सरकार का पसंदीदा बहाना होता है कि आपराधिक ट्रायल चल रहा है, इसलिए विभागीय जांच रोक दी गई है। जबकि कानून साफ कहता है कि विभागीय जांच और आपराधिक मुकदमा अलग-अलग हैं और एक के कारण दूसरे को अनिश्चितकाल तक रोका नहीं जा सकता। हाईकोर्ट ने कई मामलों में सरकार को यह बात याद भी दिलाई है। कुंडालिया बांध घोटाला हो, नर्सिंग स्कैंडल हो या परिवहन विभाग के भ्रष्टाचार मामले.अदालतों ने जांच तेज करने के निर्देश दिए। लेकिन जमीनी स्तर पर फर्क उतना ही पड़ा, जितना भाषण से पेट भरने पर पड़ता है।

 

2015 से 2023 के बीच अगर भ्रष्टाचार के कुल मामलों को देखा जाए चाहे वे ट्रैप हों, आय से अधिक संपत्ति के मामले हों या पद के दुरुपयोग के.तो संख्या हजारों में पहुंचती है। लेकिन इन हजारों मामलों में से कितनों का तार्किक अंत हुआ, यह सवाल आज भी अनुत्तरित है। ट्रैप केस इसलिए ज्यादा दिखाई देते हैं क्योंकि वे तुरंत खबर बनते हैं। कैमरे के सामने नोटों की गड्डियां होती हैं, अधिकारी का चेहरा ढका होता है और बयान आता है कि “भ्रष्टाचार पर कड़ा प्रहार।” असली भ्रष्टाचार उन फाइलों में छिपा रहता है, जहां टेंडर पास होते हैं, ट्रांसफर होते हैं, पोस्टिंग होती है और नीति के नाम पर निजी फायदे साधे जाते हैं। वहां न ट्रैप लगता है, न सुर्खियां बनती हैं।

 

मोहन सरकार के दौर में भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वह मैनेज हो गया है। न ज्यादा हंगामा, न ज्यादा सजा। ट्रैप होने दिया जाता है ताकि जनता को लगे कि कार्रवाई हो रही है, और विभागीय जांच लटका दी जाती है ताकि सिस्टम नाराज़ न हो। यह संतुलन ही सरकार की असली नीति बन चुका है। भ्रष्टाचार खत्म करना शायद लक्ष्य ही नहीं है, लक्ष्य है उसे नियंत्रण में रखना।

 

भ्रष्ट सरकार की परिभाषा अक्सर गलत समझी जाती है। भ्रष्ट सरकार वह नहीं होती जहां एक भी भ्रष्टाचार का मामला सामने आए। भ्रष्ट सरकार वह होती है जहां भ्रष्टाचार सामने आने के बाद भी व्यवस्था नहीं बदलती। जहां पकड़े जाने का डर नहीं होता, जहां सजा अपवाद बन जाती है और जहां ईमानदारी मूर्खता मानी जाने लगती है। अगर हर साल सैकड़ों अधिकारी पकड़े जा रहे हैं और फिर भी सिस्टम उसी गति से चलता है, तो यह साफ संकेत है कि समस्या व्यक्ति की नहीं, ढांचे की है।

 

मोहन सरकार के सुशासन मॉडल में सबसे बड़ा व्यंग्य यह है कि सरकार खुद अपने आंकड़ों से कठघरे में खड़ी हो जाती है। जितने ज्यादा ट्रैप केस, उतना बड़ा दावा कि कार्रवाई हो रही है। लेकिन कोई यह नहीं पूछता कि कार्रवाई के बाद क्या हुआ। कितने अधिकारियों को सेवा से बर्खास्त किया गया, कितनों की संपत्ति जब्त हुई, कितनों को ऐसी सजा मिली कि वह दूसरों के लिए उदाहरण बन सके। जब इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, तब हर नया ट्रैप केस पुराने आरोपों को और मजबूत कर देता है।

 

आज मध्यप्रदेश में भ्रष्टाचार कोई छुपा हुआ खतरा नहीं, बल्कि एक सामान्य अनुभव बन चुका है। आम आदमी यह मानकर चलता है कि बिना “खर्चा-पानी” के काम नहीं होगा। यह मानसिकता सरकार की सबसे बड़ी हार है। क्योंकि जब जनता ही मान ले कि सिस्टम ऐसा ही है, तब सुशासन सिर्फ एक शब्द रह जाता है।

 

सवाल मोहन सरकार से सीधा और सरल है। अगर आपकी सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ है, तो उसे ट्रैप के आंकड़ों से नहीं, सजा के उदाहरणों से साबित कीजिए। विभागीय जांच को सालों तक लटकाने की बजाय समयबद्ध कीजिए। दोषियों को बचाने की बजाय उन्हें सार्वजनिक रूप से दंडित कीजिए। क्योंकि जब तक ऐसा नहीं होगा, तब तक हर भाषण, हर विज्ञापन और हर दावा एक ही व्यंग्य को जन्म देगा.कि मध्यप्रदेश में भ्रष्टाचार पकड़ा जाता है, लेकिन खत्म नहीं किया जाता। और यही किसी भी सरकार के लिए सबसे बड़ा, सबसे स्थायी और सबसे शर्मनाक आरोप होता है।

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