पागल और ज्यादा समझदार में एक समानता होती है

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पागल और ज्यादा समझदार में एक समानता होती है. दोनों एक दूसरे की बात नहीं सुनते हैं. राजनीति सुनने और सुनाने का ही प्रोफेशन है. जब स्थापित परिवारों की वंशवादी राजनीति के ऐसे वारिस आते हैं जो किसी की नहीं सुनते हैं तब दोस्त और साथी भी साथ छोड़ने लगते हैं.
सियासत में आना-जाना आम बात है लेकिन जब कोई साथ है तो यार है और जैसे वह अलग हो तो गद्दार हो जाए, यह नफरती विचार खुद और पार्टी के बंटाढार का बड़ा कारण बनता है. पुराने कांग्रेसी और वर्तमान में बीजेपी से सांसद केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू और राहुल गांधी के बीच हुआ कटु संवाद संसदीय व्यवस्था पर सवालिया निशान खड़ा करता है.
बजट सत्र के दौरान कांग्रेस अपने कुछ सांसदों को सदन से निलंबित करने के विरोध में संसद के मकर द्वार पर प्रदर्शन कर रही थी. इसी दौरान राहुल गांधी ने रवनीत सिंह बिट्टू को पास से गुजरते देखकर कहा- देखो एक गद्दार जा रहा है, देखिए इसका चेहरा. राहुल गांधी ने हाथ मिलाने की पेशकश करते हुए कहा कि हेलो भाई मेरे गद्दार दोस्त, चिंता मत करो आप वापस कांग्रेस में आ जाओगे.
केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने हाथ नहीं मिलाया. उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया कि देश की दुश्मनों से मेरा कोई लेना-देना नहीं है. राहुल गांधी जिस विरासत की अगुवाई कर रहे हैं उसके लिए अपने किसी पूर्व सहयोगी को जो वर्तमान में केंद्रीय मंत्री है उसे गद्दार बताना उस विरासत का खुला अपमान है. बिट्टू अकेले नेता नहीं है जो राहुल गांधी के कार्य पद्धति और कांग्रेस के व्यवस्था से असंतुष्ट होकर पार्टी से बाहर गए हैं. यह तो एक लंबा सिलसिला है.
पंडित जवाहरलाल नेहरू के समय से ही यह शुरू हो गया था. देश में जितने क्षेत्रीय दल प्रभावी हैं, उनमें से अधिकांश कांग्रेस से निकले ही नेता हैं. इंदिरा गांधी के समय भी कांग्रेस विभाजित हुई थी. राजीव गांधी के समय भी वी पी सिंह ने कांग्रेस छोड़कर अपनी पार्टी बनाई थी और कांग्रेस को पराजित किया था. सोनिया गांधी के समय एनडी तिवारी और अर्जुन सिंह भी उन नेताओं में थे जिन्होंने कांग्रेस छोड़कर नई पार्टी बनाई थी.
राहुल गांधी ने जब से पार्टी का नेतृत्व संभाला है, तब से उनके निकटतम सहयोगियों के पार्टी छोड़ने का सिलसिला लगातार जारी है. जिन भी नेताओं ने पार्टी छोड़ी है उनमें से अधिकांश ने राहुल गांधी की कार्यशैली पर ही सवाल उठाया है. गुलाम नबी आजाद ने तो खुला पत्र लिखकर पार्टी में अव्यवस्था के लिए राहुल गांधी को ही जिम्मेदार बताया था. राहुल गांधी के कई मित्र कहे जाने वाले युवा नेता भी कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए हैं. उनमे ज्योतिरादित्य सिंधिया को तो उनका ख़ास मित्र माना जाता था. उन्होंने भी कांग्रेस छोड़कर बीजेपी ज्वाइन कर ली है.
राहुल गांधी ने आज रवनीत सिंह बिट्टू के साथ जो व्यवहार किया है उसने यह स्थापित किया है कि उनका नजरिया कितना संकीर्ण है. जो उनके विचार से सहमत नहीं है जो उनके परिवार और कार्य शैली से असहमत है, जो उनकी विचारधारा और अप्रोच को राष्ट्रहित में नहीं मानता है वह पार्टी छोड़कर चला जाता है, वह राहुल गांधी की नजर में गद्दार हो जाता है.
अगर इन विचारों को माना भी जाए तो इसका यह भी मतलब है, कि पहले वही गद्दार कांग्रेस और गांधी परिवार द्वारा पाले-पोसे जा रहे थे, पार्टी छोड़ने के बाद जो नेता राहुल गांधी को गद्दार दिखाई पड़ रहे हैं वे जब पार्टी में थे तब उनकी आंखों के तारे थे. पार्टी से अलग होते ही उनमे गद्दारी के बीज दिखाई पड़ रहे हैं,
राहुल गांधी में अपनी विरासत का अहंकार साफ झलकता है. वे स्पीकर के दिशा-निर्देशों को भी दरकिनार करते हैं. संसद में नियम प्रक्रिया की भी परवाह नहीं करते हैं. राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा में भी उन्होंने पूर्व सेना अध्यक्ष की कथित पुस्तक की टिप्पणी पर राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा उठाने की कोशिश की है, नेता प्रतिपक्ष के नाते उन्हें हेडलाइन बनाने से ज्यादा राष्ट्रहित और सेना के मनोबल की चिंता करना चाहिए.
कांग्रेस के जो सांसद निलंबित किए गए हैं, वह इसी घटनाक्रम के तहत सदन में पेपर फेंकते हैं. अनुशासनहीनता को नियंत्रित करने की बजाय अनुशासन हीन सांसदों को संरक्षण देने में वे सबसे आगे खड़े दिखाई पड़ते हैं.
राहुल गांधी संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल खड़े करते हैं. देश का शासन चलाने वाली पार्टी की विचारधारा को समझने की बजाय उसे देश विरोधी बताने में उनकी रुचि रहती है. चुनाव आयोग को तो वोट चोरी के आरोपों से लादते लादते शायद वे थक गए हैं. बिहार चुनाव में राहुल की वोट चोरी की बातों को स्वीकार नहीं किया गया.
भारत अमेरिका के साथ ट्रेड डील के मामले में भी खबर आते ही भ्रम फैलाने की राजनीति चालू हो गई है. जब वाणिज्य मंत्री सदन में इस डील पर अपना वक्तव्य दे रहे थे तब भी पूरा विपक्ष नारीबाजी कर रहा था.
राहुल गांधी की गंभीरता अनुभवों के साथ बढ़ना चाहिए लेकिन वह धीरे-धीरे नीचे की तरफ जाती दिखाई पड़ती है. उनके द्वारा उठाए जाने वाले सारे मुद्दे जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता नहीं स्थापित नहीं कर पाते. शायद इसी कारण चुनावी राजनीति में कांग्रेस को नुकसान भी उठाना पड़ता है. कांग्रेस के भीतर भी राहुल गांधी के विचारों से असहमति साफ दिखती है. राहुल गांधी स्वयं भी रेस-बारात और लंगड़े घोड़े के बीच तुलना कर अपने नेताओं को ही कटघरे में खड़ा करते हैं.
सियासत अब विरासत या परिवार से नहीं चल सकती. खुद की योग्यता और अयोग्यता ही सफलता असफलता बनाती है कांग्रेस की कार्यशैली में सुधार के सूत्रधार राहुल हो सकते हैं लेकिन राहुल में सुधार के लिए तो उन्हें खुद ही आत्म मंथन करना होगा.

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