पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने छत्रपति शिवाजी महाराज जी की जन्म जयन्ती पर अनेक शुभकामनाएँ देते हुए कहा – समर्थ गुरु पूज्यपाद श्री रामदास जी के संरक्षण एवं अनुशासन में रहकर राष्ट्र रक्षा के लिए अखण्ड-प्रचण्ड पुरुषार्थ करने वाले हिन्दू हृदय सम्राट जिन्होंने विधर्मियों के कुटिल षड्यंत्रों को ध्वस्त कर सनातन वैदिक हिन्दू संस्कृति, संस्कार और संवेदनाओं की अभिरक्षा की भारत की वैदिक सनातन-संस्कृति के सबल संपोषक अपने विलक्षण युद्ध-कौशल के लिए लोकख्यात, अपराजेय योद्धा, नारी अस्मिता के रक्षक, नैतिक मूल्यों के संपोषक, कुशल प्रशासक, महान शासक एवं उपासक छत्रपति शिवाजी महाराज की जन्म-जयन्ती पर अत्यन्त आदरपूर्वक पुण्य स्मरण ! छत्रपति शिवाजी महाराज एक महान योद्धा एवं रणनीतिकार होने के साथ-साथ धर्म व राष्ट्रीयता के जीवन्त प्रतीक थे। उन्होंने अपने राज्य में सुशासन की कल्पना को साकार कर एक लोक-कल्याणकारी राज्य की स्थापना की। दृढ़-निश्चयी, महान देशभक्त, धर्मात्मा, राष्ट्र निर्माता तथा कुशल प्रशासक शिवाजी महाराज का व्यक्तित्व बहुमुखी था। माँ जीजाबाई के प्रति उनकी श्रद्धा और आज्ञाकारिता उन्हें एक आदर्श सुपुत्र सिद्ध करती है। मराठों की सत्ता सम्भालने वाले शिवाजी ने न केवल युद्ध में जीत का परचम लहराया, बल्कि भेदभाव जैसी चीज़ों को मिटाने के लिए भी हर सम्भव प्रयास किये। भारतीय इतिहास के रंगमंच पर छत्रपति शिवाजी महाराज का अभिनय केवल एक कुशल सेनानायक एवं विजेता का न था, वह एक उच्च श्रेणीं के शासक भी थे। वे जीवन पर्यन्त साहसिक कार्य करते रहे और हमेशा गरीब, बेसहारा लोगों को प्रेम और सम्मान देते रहे। दीन, दलित, नारी का संरक्षण किया। पर-स्त्री को माता समान माना। छत्रपति शिवाजी किसी धर्म या जाति के विरोध में नहीं थे, अपितु वे अन्याय व अत्याचार के प्रतिकूल थे। छत्रपति शिवाजी राष्ट्रपुरुष के साथ युग पुरुष भी थे। उनका व्यक्तित्व इतना आकर्षक था कि उनसे मिलने वाला हर व्यक्ति उनसे प्रभावित हो जाता था। साहस, शौर्य तथा तीव्र बुद्धि के धनी थे। उनका अदम्य साहस, उनकी बहादुरी व उनके सन्देश हमको सदैव प्रेरित करते रहेंगे …।
पूज्य “प्रभुश्री” जी ने कहा – जीजाबाई जैसी महान माँ हो तो देश को शिवाजी जैसा ही पुत्र मिलेगा। शिवाजी केवल मराठा राष्ट्र के निर्माता ही नही थे, अपितु मध्ययुग के सर्वश्रेष्ठ मौलिक प्रतिभा-सम्पन्न व्यक्ति थे। महाराष्ट्र की विभिन्न जातियों के संर्धष को समाप्त कर उनको एक सूत्र में बाँधने का श्रेय शिवाजी को ही है। इतिहास में शिवाजी का नाम, हिन्दू रक्षक के रूप में सदैव सभी के मानस पटल पर विद्यमान रहेगा। माता जीजाबाई से वीरता की कहानियाँ सुनकर शिवाजी बड़े हुए और उन्हें गुरु स्वामी रामदास का सानिध्य प्राप्त हुआ। शिवाजी अपने गुरु का बहुत सम्मान करते थे। उन्होंने गुरु की चरण पादुका रखकर शासन किया। समर्थ गुरु रामदास ही छत्रपति शिवाजी के गुरु थे। वह स्वदेश और स्वराष्ट्र के प्रति अपने शिष्यों में उत्साह भरते थे। वह प्रायः शिवाजी को उपदेश दिया करते थे कि – “हे शिवा ! तू बल की उपासना कर, बुद्धि को पूज, संकल्पवान बन और चरित्र की दृढ़ता को अपने जीवन में उतार, यही तेरी ईश्वर-भक्ति है। भारतवर्ष में बढ़ रहे पाप, हिंसा, अनैतिकता और अनाचार के यवनी-कुचक्र से लोहा लेने और भगवान की सृष्टि को सुन्दर बनाने के लिये इसके अतिरिक्त कोई उपाय नहीं है।” सर्वप्रथम राष्ट्र, फिर गुरु, फिर माता-पिता फिर परमेश्वर, अत: पहले स्वयं को नहीं राष्ट्र को देखना चाहिए। अपने गुरुदेव के वचनों को बड़े ध्यान से सुनने के बाद शिवाजी बड़ी ही विनम्रता से कहते हैं – “आज्ञा शिरोधार्य देव। किन्तु, यह तो गुरु-दीक्षा हुई। अब, गुरु दक्षिणा का आदेश दीजिये।” यह सुनते ही गुरु की आँखें चमक उठीं। शिवाजी के शीश पर हाथ फेरते हुए बोले – “गुरु-दक्षिणा में मुझे एक लाख शिवाजी चाहिये, बोल देगा?” शिवाजी दृढ़ विश्वास से कहते हैं – “हाँ, अवश्य दूँगा गुरुदेव। एक वर्ष एक दिन में ही यह गुरु-दक्षिणा चुका दूँगा।” इतना कहकर शिवाजी ने गुरुदेव की चरण धूलि ली और महाराष्ट्र के उद्धार के लिए सेना निर्माण में जुट गये …।
पूज्य “प्रभुश्री” जी ने कहा – छत्रपति शिवाजी एक न्यायप्रिय शासक थे और वे सभी धर्मों का समान रूप से आदर करते थे। वह बलपूर्वक धर्मांतरण के सख्त खिलाफ थे। छत्रपति शिवाजी ने कम उम्र में ही राष्ट्रहित और जनहित कार्य आरम्भ किया। वे कुशल प्रशासक होने के साथ-साथ एक समाज सुधारक भी थे। हिन्दू ही नहीं, अपितु उनकी सेना में मुस्लिम भी मुख्य पदों पर तैनात रहते हुए मुगलों से युद्ध करते रहे। इब्राहिम खान और दौलत खान उनकी नौसेना के खास पदों पर थे। सिद्दी इब्राहिम उनकी सेना के तोपखानों के प्रमुख थे। जब शिवाजी ने कल्याण दुर्ग पर विजय प्राप्त की और उनके सेनापति आवाजी सोनदेव ने कल्याण के परास्त मुस्लिम सूबेदार की अति सुन्दरी पुत्रवधू गौहर बानू को बंदी बनाकर उनकी सेवा में प्रस्तुत किया। गौहर बानू अप्रतिम सुन्दरी थी। शिवाजी ने अपनी व अपने सूबेदार सोनदेव की ओर से उनसे क्षमा माँगी और कहा कि काश ! मेरी माँ भी आपकी तरह सुन्दर होती तो मैं भी इतना ही सुन्दर होता। उन्होंने उनको मुक्त कराकर ससम्मान उनके परिवार के पास भेज दिया। छत्रपति शिवाजी बहुत ही चरित्रवान व्यक्ति थे। वे महिलाओं का बहुत आदर करते थे। महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार और निर्दोष व्यक्तियों की हत्या करने वालों को वे कड़ा दंड देते थे। छत्रपति शिवाजी को एक साहसी, चतुर व नीतिवान हिन्दू शासक के रूप में सदा याद किया जाता रहेगा। अपनी बहादुरी, साहस एवं चतुराई से उन्होंने औरंगजेब जैसे शक्तिशाली मुगल सम्राट की विशाल सेना से कई बार लोहा लिया और अपनी शक्ति को बढ़ाया। शिवाजी ने आदिलशाही सल्तनत की अधीनता स्वीकार ना करते हुए उनसे कई लड़ाईयाँ की थी। उन्होंने गुर्रील्ला पद्दति से कई युद्ध जीते। इन्हें आद्य-राष्ट्रवादी और हिन्दूओं का नायक भी माना जाता है। उनका ऐसा मानना था कि यदि मनुष्य के पास चरित्र-बल है और आत्म-बल है तो वो पूरे संसार पर अपने पुरुषार्थ से विजय पताका लहरा सकता है …।