सूर्य की पहली किरण का मंदिर – कोणार्क

सूर्य मंदिर ओड़िशा के समुद्र तट पर पुरी शहर से लगभग 35 किलोमीटर उत्तर पूर्व में स्थित 13 वीं शताब्दी का निर्मित मंदिर है। इसके निर्माण का श्रेय पूर्वी गंगावंश के राजा नरसिंह देव प्रथम को दिया जाता है। आप तेरहंवी सदी के राजा की दूरगामी सोच को महसूस करें। सृष्टि की ऊर्जा का केन्द्र सूर्य का मंदिर। इसे देखने की उत्सुकता हमें मंदिर तक ले आई।
सूर्य मंदिर दक्षिण अमेरिका से लेकर अफ़्रीका और चीन तक बनाये गये। भारत में भी कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक सूर्य मंदिरों का निर्माण हुआ।
पत्थरों को तराश कर बनाया गया यह एक विशाल मंदिर है जिसमें बहुत से भव्य द्वार और विशाल मूर्तियाँ हैं। मूर्तिकला के माध्यम से यह जीवन के सार को प्रदर्शित करता है। रचनात्मकता एवं कलाकृति की दृष्टि से यह अद्भुत है।
कोणार्क सूर्य मंदिर के निर्माण में दिशाओं का इस प्रकार से विशेष ध्यान रखा गया है कि किसी भी ऋतु में केवल सूर्य की किरणों से समय का अनुमान लगाया जा सके। इसके अलावा मंदिर में रथ के जो पहिये बने हैं वे जीवन के विभिन्न चरणों को दर्शाते हैं।
कोणार्क पहुँचने पर मन में एक सवाल आया – भारत के इतने महत्वपूर्ण कला और विज्ञान के प्रतीक के बारे में स्कूल में हमें विस्तार से क्यों नहीं पढ़ाया गया जबकि कई और निरर्थक स्मारकों को पाठ्यक्रम में ज़्यादा महत्व दिया गया। कई ऐसे जो इतनी योग्यता भी नहीं रखते और जो केवल लोगों के दुखों की कहानियाँ सुनाते हैं। यह मंदिर सकारात्मक ऊर्जा का भंडार है। इस सूर्य मंदिर पर तो पीएचडी की पूरी थीसिस लिखी जा सकती है।
मेरे बच्चों ने जब इसे देखा तब वे अत्यधिक प्रसन्न हुए और उत्साह से सराबोर होकर उन्होंने मुझसे ढेरों सवाल किए। प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर पाकर वे फोटोग्राफी में व्यस्त हो गये और मैं कला के विशाल समुद्र में गोते लगाने लगा। उनके सवालों से मुझे आभास हुआ कि प्रत्येक बच्चे को इसके बारे में जानना कितना आवश्यक है। स्कूल के पाठ्यक्रम में इसके बारे में और अधिक विस्तार से पढ़ाने की आवश्यकता है क्योंकि यह जिज्ञासा पैदा करता है और बच्चों में वैज्ञानिक सोच विकसित करने में बहुत सहायक है।
सूर्य मंदिर वो अनूठा स्थान है जहां आस्था और विज्ञान का समागम होता है। यह हमारी संस्कृति की वास्तविक सोच और कला का एक और उत्कृष्ठ उदाहरण है।
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Odisha
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