MP की वो सीट जहां ‘पहाड़’ से हारे अजित जोगी:दो बार ‘मैदान’ का सांसद जीता, इस बार मिठाई पहाड़ी के घर में बंटेगी
शहडोल लोकसभा सीट कई मायनों में इस बार बेहद रोचक है। ये वही सीट है जिस पर छत्तीसगढ़ के सीएम रहे अजीत जोगी चुनाव हार चुके हैं। जिस फैक्टर की वजह से वो यहां चुनाव हारे उसी फैक्टर ने यहां लगातार कई उम्मीदवारों के अरमान पर पानी फेरा। ये फैक्टर है-पहाड़ बनाम मैदान का।
इस चुनाव में भाजपा-कांग्रेस दोनों ने ‘नो रिस्क पॉलिसी’ के तहत पहाड़ के उम्मीदवार को ही मैदान में उतारा है। दोनों राजेंद्र ग्राम में रहते हैं। और तो और उनके घरों के बीच की दूरी भी महज 500 मीटर है। पहाड़ी लोग मजाक में कह रहे हैं कि इस बार जीते-हारे कोई भी, पहाड़ के हर घर में मिठाई बंटना तय है।

पहले पहाड़ी फैक्टर क्या है? ये जानिए…
बात अविभाजित मध्यप्रदेश के दौर की है। 1999 में अजीत जोगी शहडोल लोकसभा सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार थे। वे पहले शहडोल में कलेक्टर भी रह चुके थे। मध्यप्रदेश के विभाजन के बाद वे छत्तीसगढ़ के सीएम भी बने।
चुनाव को दूर से देखने वाले ये मानकर चल रहे थे कि अजीत जोगी ये चुनाव आसानी से जीत लेंगे, लेकिन करीब से देखने वालों को पता था कि ऐसा नहीं होने जा रहा। उस चुनाव में कुल आठ उम्मीदवार थे। जब परिणाम आए तो अजीत जोगी भाजपा के उम्मीदवार दलपत सिंह से चुनाव हार गए थे।
दलपत सिंह को अजित जोगी के मुकाबले 19 हजार 901 वोट ज्यादा मिले। दलपत सिंह पहाड़ से थे और अजित जोगी मैदानी इलाके से। तभी से राजनीतिक विश्लेषकों के बीच ये चर्चा शुरू हो गई कि पहाड़ फैक्टर के कारण ही जोगी की हार हुई।
इतिहास के बाद अब भूगोल समझिए…
दरअसल, शहडोल लोकसभा की भौगोलिक स्थिति कुछ ऐसी ही है। इस लोकसभा की पुष्पराजगढ़ विधानसभा चारों ओर पहाड़ी से घिरी है। जबकि अन्य 7 विधानसभा मैदानी इलाके में हैं। 47 साल से यहां की राजनीति पहाड़ बनाम मैदान के बीच सिमटी है। इस दौरान सिर्फ तीन बार ही मैदानी इलाके से आने वाले ज्ञान सिंह ही सांसद बन पाए। वो भी किसी लहर या किसी अन्य फैक्टर के हावी होने पर।

ये भी दिलचस्प…मां को जिसने दी चुनौती, उसी से रचाई शादी
पहाड़ बनाम मैदान की जंग 2009 में भी थी। तब मौजूदा सांसद हिमाद्री सिंह की मां राजेश नंदिनी के सामने भाजपा ने जयसिंहनगर के रहने वाले नरेंद्र सिंह मरावी को प्रत्याशी बनाया था। 2017 के चुनाव में हिमाद्री सिंह ने हार के बाद इसी मैदान के रहने वाले भाजपाई नरेंद्र सिंह मरावी से शादी रचाई और बाद में भाजपा में शामिल होकर 2019 में सांसद बनकर पहाड़ी की परंपरा काे बरकरार रखा।
पहाड़ के हैं तो पहाड़ वाले को ही वोट देंगे
किरगी ग्राम पंचायत की शांति प्रजापति कहती हैं कि पहाड़ के हैं तो पहाड़ वालों को ही वोट देंगे। पहले सुदामा सिंह, फिर फुंदेलाल मार्को को जिताया। अब संसद में हिमाद्री हैं। इससे पहले उनके पापा और मम्मी राजेश नंदिनी जीते थे। हम खालहे (मैदान) वालों को नहीं जानते हैं।

सबसे ज्यादा सांसद पहाड़ के ही क्यों चुने जाते हैं?
जनरल स्टोर्स संचालक राजेंद्र प्रसाद चतुर्वेदी कहते हैं कि शहडोल लोकसभा सीट से जीतने वाले अधिकतर सांसद यहीं के रहे। ये आदिवासी बहुल विधानसभा है। दलपत और दलबीर सिंह से शुरू हुई परंपरा को राजेश नंदिनी और अब हिमाद्री सिंह आगे बढ़ा रही हैं।
इस बार भी कांग्रेस-भाजपा के दोनों प्रत्याशी पुष्पराजगढ़ से ही हैं। इसका फायदा ये है कि इस क्षेत्र के लोगों को स्थानीय प्रतिनिधि मिल जाता है। लोगों की जो भी समस्याएं होती हैं, वे सांसद के पास पहुंच जाते हैं।
पुष्पराजगढ़ पहाड़ पर बसा हुआ है। इसी कारण इसे पाठ बोलते हैं। नीचे के लोगों को यहां खलहा बोला जाता है। इस बार भी मोदी की लहर है। इसी वजह से हिमाद्री जीतेंगी। जहां तक विकास की बात है, तो केंद्र की सरकार अच्छा काम कर रही है।

अब तक 13 चुनाव, पहाड़ के ही सांसद चुने गए
1977 से अब तक 13 चुनाव हो चुके हैं। 10 बार पहाड़ के ही सांसद चुने गए। जबकि 7 सीट वाले मैदान से सिर्फ 3 बार ही सांसद जीत पाए। राजेंद्र प्रसाद चतुर्वेंदी इसकी वजह बताते हुए कहते हैं कि पुष्पराजगढ़ सबसे बड़ी विधानसभा है। ये आदिवासी लोकसभा सीट है। यहां आदिवासियों की संख्या 90 प्रतिशत है। बाकी 10 प्रतिशत में सभी जातियां शामिल हैं। इसी वजह से अधिकतर प्रत्याशी यहीं के होते हैं।
दलपत सिंह 5 बार सांसद चुने गए
पहाड़ में सबसे पहले दलपत सिंह सांसद चुने गए। वे 5 बार सांसद बने। कांग्रेस के दलबीर सिंह 1980 में सांसद चुने गए। वे 3 बार सांसद रहे। फिर इसी क्षेत्र से उनकी पत्नी राजेश नंदिनी और बेटी हिमाद्री सिंह ने एक-एक बार इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। सिर्फ 3 बार उमरिया के ज्ञान सिंह ही सांसद बन सके। इस बार भी कांग्रेस-भाजपा ने पुष्पराजगढ़ से ही प्रत्याशी उतारा है।
रीवा नरेश और डॉ. राजेंद्र प्रसाद के नाम से जाना जाता है इलाका
क्षेत्रफल की दृष्टि से अनूपपुर जिले की सबसे बड़ी विधानसभा पुष्पराजगढ़ है, जिसका मुख्यालय राजेंद्र ग्राम में है। राजेंद्र ग्राम किरगी ग्राम पंचायत के अंतर्गत आता है। इसी कारण इसे तीन नाम से जानते हैं। रीवा नरेश के घर जन्मे पुष्पराज सिंह के नाम पर इस पहाड़ी हिस्से को पुष्पराजगढ़ और देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के यहां आने की वजह से इसका नाम राजेंद्र ग्राम पड़ गया।

शहडोल लोकसभा का जातीय समीकरण भी समझ लेते हैं
2011 की जनगणना के मुताबिक शहडोल लोकसभा में 44.76 फीसदी आबादी आदिवासी और 9.35 फीसदी आबादी अनुसूचित जाति वर्ग की है। यहां 30 फीसदी ओबीसी आबादी है। इस लोकसभा में कुल 17,12,640 वोटर हैं। इसमें पुरुष मतदाता 8,72,872, महिला मतदाता-8,39,738 और थर्ड जेंडर-30 हैं।
लोकसभा में अनूपपुर जिले की तीन पुष्पराजगढ़, कोतमा व अनूपपुर, शहडोल जिले की जयसिंहनगर व जैतपुर, उमरिया जिले की मानपुर व बांधवगढ़ और कटनी जिले की बड़वारा विधानसभा शामिल हैं। इसमें पुष्पराजगढ़ को छोड़कर सभी 7 सीटों पर भाजपा का कब्जा है।
पुष्पराजगढ़ से लगातार तीन बार के विधायक फुंदेलाल मार्को पर ही कांग्रेस ने इस बार दांव खेला है। जबकि भाजपा ने मौजूदा सांसद हिमाद्री सिंह को प्रत्याशी बनाया है।
पुष्पराजगढ़ से सांसद-विधायक चुने जा रहे, तो यहां का विकास कितना?
मानपुर गांव के अजीत कुमार गुप्ता इसका जवाब देते हुए कहते हैं कि यहां का विकास तो थोड़ा बहुत हो रहा है। अभी ग्राम पंचायत ही यहां का विकास देख रही है। नगर परिषद या नगर पंचायत बनाने का प्रयास किसी ने नहीं किया। वर्तमान में तो बीजेपी का ही शोर है। कांग्रेस तो कहीं है ही नहीं। आज की डेट में मोदी ही दिख रहा है। उसका प्रभाव है। अच्छा काम कर रहा है। चुनाव के बाद शायद पुष्पराजगढ़ को नगर परिषद या नगर पंचायत बना दिया जाए।
कस्बे के धर्मप्रकाश गुप्ता सीधे तौर पर अजीत के दावे को नकार देते हैं। वे कहते हैं कि यहां का विकास जीरो है। फुंदेलाल तीन बार जीत गए। हिमाद्री भी एक बार सांसद बन गईं, लेकिन 40 बेड वाले सीएचसी में 8 पोस्ट वाले विशेषज्ञ डॉक्टरों में कोई पदस्थ नहीं है। अब भी इलाज के लिए अनूपपुर या प्राइवेट अस्पताल जाने की मजबूरी है।
सांसद-विधायक को हमारी समस्या सुनने की फुरसत ही नहीं है। कभी हम लोगों के पास आएं, तब तो बताएं। दोनों प्रत्याशी मुझे चाचा कहते हैं। गुस्से में बोले- लेकिन कभी सुनते नहीं। राजेंद्र ग्राम में अधिकांश कर्मचारी वर्ग के लोग रहते हैं। वे आज नौकरी किए, कल चल देंगे। उन्हें विकास से क्या लेना-देना है।
राजेंद्र नगर की जो मुख्य रोड बनी है, उसके एक ओर 50 फीट की दूरी पर और दूसरी ओर 30 फीट की दूरी पर नाली बना दी है। यहां एसडीएम बंगला, तहसील मुख्यालय, कोर्ट, पीएचई, मछली विभाग, सामुदायिक अस्पताल है। पर हम अब भी सरपंच ही चुनते हैं। नेता लोग चाहते हैं कि ये ग्राम पंचायत ही रहे। वोट के सवाल पर कहते हैं कि इस बार भी हिमाद्री ही जीतेगी। मोदी के नाम पर उसे वोट मिल रहा है।

आदिवासी क्षेत्रों में रोड, पानी और बिजली तीनों की समस्या
पुष्पराजगढ़ सामुदायिक अस्पताल वाली गली में मेडिकल की दुकान चलाने वाले विवेक शुक्ला कहते हैं कि यहां दोनों प्रत्याशियों में टक्कर है। ये कांग्रेस का गढ़ रहा है। दलबीर सिंह कई वर्षों तक विधायक, सांसद और केंद्र में मंत्री रहे। उनकी पत्नी राजेश नंदिनी भी सांसद बनीं। इससे पुष्पराजगढ़ कांग्रेस का गढ़ बन गया।
आज भी विधायक फुंदेलाल मार्को तीन बार से चुने जा रहे हैं। भाजपा ने दलबीर की बिटिया हिमाद्री को टिकट दिया है। दोनों प्रत्याशियों में बराबर की टक्कर दिख रही है। इस पहाड़ी क्षेत्र में राजेंद्रग्राम कस्बे को छोड़ दें तो अधिकतर आदिवासी आबादी गांव में रहती है।
वहां आवाजाही के लिए रोड तक नहीं बन पाया है। पेयजल नहीं है। एक ही कॉलेज है। यहां टोले बहुत बने हैं। गांव तक रोड पहुंच भी गई है, तो टोले-मजरे अछूते हैं।

पुष्पराजगढ़ के गांवों में कितना पहुंचा विकास?
डोंगरी कला निवासी कमल सिंह सरकार को आइना दिखाते हुए कहते हैं कि मेरी दमेहरी ग्राम पंचायत है। दमेहरी चौराहा से डोंगरी कला नर्मदा घाट तक 3 किमी की रोड बनाने के लिए 2019 से आवेदन दे रहा हूं। सरपंच से लेकर जिला पंचायत सदस्य तक ने पूरे गांव वालों के हस्ताक्षर कराकर कई बार गुहार लगाई। फिर भी ये रोड नहीं बन पा रही हैं। अभी तक भाजपा को वोट देते आ रहे हैं। एक बार कांग्रेस को भी देकर देख लूं कि वे कैसा विकास करते हैं।
चर्चा के दौरान एक खेती-किसानी से जुड़े एक ग्रामीण कमला सिंह धुर्वे कहते हैं कि लगभग 5-6 बार हो गया। पाठन (पहाड़) के ही सांसद जीत रहे हैं। रोड-तालाब तो कई गांव में बन गए, लेकिन सिंचाई का साधन नहीं है। नल-जल योजना का कनेक्शन दे दिया गया है, पर कुछ न कुछ खराबी के चलते पानी नहीं मिल पा रहा। कभी पाइप फूट जाता तो कभी कोई और समस्या खड़ी हो जाती है।
स्थानीय सासंद होने का फायदा ये है कि उन तक हम अपनी समस्या का निवेदन कर पाते हैं। खाले (तराई) के सांसद को आज तक नहीं जान पाए। तीन बार ज्ञान सिंह सांसद रहे, कभी इधर नहीं आए। यही वजह है कि यहां के लोग लोकल को सांसद न बनाएंगे तो क्या खाले वाले को बनाएंगे। मेरा गांव राजेंदग्राम से 100 किमी की दूरी पर है, पर आज तक विधायक को नहीं देखा। हिमाद्री जरूर कई कार्यक्रम में आ चुकी हैं। बीजेपी वाले काम तो कर रहे हैं। अभी मेरे ही एक टोले में बैगा परिवार के लिए 52 आवास बन रहे हैं।

जिगरी पंचायत के अमौहता निवासी विश्वनाथ सिंह उइके का दर्द छलक पड़ता है। वे कहते हैं कि आज तक मेरे गांव में बिजली नहीं है। ये हो जाता तो बहुत अच्छा होता। राजेंद्रग्राम का तो फिर भी विकास हुआ, लेकिन हमारे गांवों में कहीं रोड नहीं, तो कही पानी नहीं है। मेरा गांव अनूपपुर जिले के आखिरी ब्लॉक में है। यहां बड़ी संख्या में बैगा लोग रहते हैं। हम नदी में पानी पीने जाते हैं। स्कूल के बच्चे भी नदी का ही पानी पीने जाते हैं।
कई बार पीएचई विभाग को फोन किया, आवेदन दिया, लेकिन कुछ नहीं हुआ। ये लोग ध्यान नहीं देते। नेता केवल वोट लेते हैं। जीतने के बाद अपना महल बना लेते हैं। गांव के सरपंच-सेक्रेटरी भी ऐसे ही हैं।
शनिचरा गांव के लमतू बैगा कहते हैं कि सरकार ने आवास स्वीकृत कर दिया, लेकिन रोड न होने से मकान निर्माण का माल ही नहीं पहुंच पा रहा है। बैगा के लिए पीने का पानी तक नहीं है। एक किमी दूर से पानी ढोना पड़ रहा है। रोड-पानी की समस्या के लिए न तो सरपंच सुने, न सेक्रेटरी। खेती किसानी से जुड़े ग्रामीण गलीराम कहते हैं कि विकास जिस हिसाब से होना चाहिए, वैसा नहीं हुआ। पानी व रोड की समस्या है। बिजली रोज नहीं मिलती है।

