पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – पराम्बा माँ दुर्गा की छठी विभूति माँ कात्यायनी देवताओं की प्रार्थना पर कात्यायन ऋषि की पुत्री के रूप में प्रकट हुईं और महिषासुर नामक दुर्दान्त दैत्य का वध किया था। द्वापर युग में योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण को पति रूप में प्राप्त करने के लिए भगवती माँ राधारानी समेत गोपांगनाओं ने माँ की उपासना की थी। ये आज्ञाचक्र की अधिष्ठात्री “महायोगिन्यधीश्वरी” के नाम से लोकख्यात हैं। पराम्बा कात्यायनी की उपासना मानवीय चेतना के आरोहण में सहायक है। निश्चल भक्ति, जीवन के उच्चतर लक्ष्यों की संसिद्धी, अपार बौद्धिक सम्पदा एवं आत्म-सामर्थ्य का जागरण ही पराशक्ति की आराधना की फलश्रुति है ..! नवरात्र में किए गए प्रयास, शुभ-संकल्प बल के सहारे देवी दुर्गा की कृपा से सिद्ध होते हैं। काम, क्रोध, मद, मत्सर, लोभ आदि जितने भी राक्षसी प्रवृति हैं, उसका हनन करके विजय उत्सव मनाने का पर्व है – नवरात्रि। अतः हर एक व्यक्ति जीवनभर या पूरे वर्षभर में जो भी कार्य करते-करते शिथिल हो जाते हैं तो इससे उन्मुक्त होने के लिए इन 9 दिनों में शरीर की शुद्धि, मन की शुद्धि और बुद्धि में शुद्धि आ जाए, सत्व शुद्धि हो जाए; इस तरह के शुद्धिकरण करने का व पवित्र होने का त्योहार है – यह ‘नवरात्रि’। पूज्य “प्रभुश्री” जी ने कहा कि सम्पूर्ण ब्रज की अधिष्ठात्री देवी माँ ‘कात्यायनी’ है। इनका नाम कात्यायनी पड़ने की कथा इस प्रकार है – कत नामक एक प्रसिद्ध महर्षि थे। उनके पुत्र कात्य भी ऋषि हुए। इन्हीं कात्य के गोत्र में विश्व प्रसिद्ध महर्षि कात्यायन उत्पन्न हुए थे। उन्होंने भगवती पराम्बा की उपासना करते हुए वर्षों तक कठिन तपस्या की थी। उनकी इच्छा थी कि माँ भगवती उनके घर में पुत्री के रूप में जन्म लें। माँ ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली थी। कुछ काल बाद जब दानव महिषासुर का अत्याचार पृथ्वी पर बहुत बढ़ गया, तब भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश–तीनों ने अपने-अपने तेज का अंश देकर महिषासुर के विनाश के लिए एक देवी को उत्पन्न किया। महर्षि कात्यायन ने सर्वप्रथम इनकी पूजा की। इसी कारणवश ये “कात्यायनी” कहलाईं ..!
पूज्य “प्रभुश्री” जी ने कहा – ऐसी भी कथा मिलती है कि महर्षि कात्यायन के यहाँ ये पुत्री के रूप में उत्पन्न हुई थीं। आश्विन कृष्ण चतुर्दशी को जन्म लेकर शुक्ल सप्तमी, अष्टमी तथा नवमी तक तीन दिन इन्होंने कात्यायन ऋषि की पूजा ग्रहण कर दशमी को महिषासुर का वध किया था। माँ कात्यायनी अमोघ फलदायिनी है। इनका स्वरूप अत्यन्त भव्य और दिव्य है। इनका वर्ण स्वर्ण के समान चमकीला और भास्वर है। इनकी चार भुजाएँ हैं। इनके दाईं तरफ का ऊपर वाला हाथ अभयमुद्रा में है तथा नीचे वाला हाथ वरमुद्रा में है। इनके बाईं तरफ के ऊपर वाले हाथ में तलवार और नीचे वाले हाथ में कमल-पुष्प सुशोभित है। इनका वाहन सिंह है। दुर्गा पूजा के छठवें दिन माँ कात्यायनी की उपासना की जाती है। इस दिन साधक का मन आज्ञा चक्र में स्थित होता है। योग साधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। इस चक्र में स्थित मन वाला साधक माँ कात्यायनी के चरणों में अपना सर्वस्व निवेदित कर देता है। परिपूर्ण आत्मदान करने वाले ऐसे भक्त को सहज भाव से माँ कात्यायनी देवी के दर्शन प्राप्त हो जाते हैं। माँ कात्यायनी की भक्ति और उपासना करने से साधक को बड़ी सरलता से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-चारों फलों की प्राप्ति हो जाती है। ऐसा साधक इस लोक में स्थित रहकर भी अलौकिक तेज और प्रभाव से युक्त हो जाता है। उसके रोग, शोक, संताप, भय आदि सर्वथा विनष्ट हो जाते हैं। जन्म-जन्मान्तर के पापों को विनष्ट करने के लिए माँ कात्यायनी की उपासना से अधिक सुगम और सरल मार्ग कोई दूसरा नहीं है। इनका उपासक निरन्तर इनके सान्निध्य में रहकर परमपद का अधिकारी बन जाता है। अतः हमें सर्वतोभावेन माँ कात्यायनी की पूजा-आराधना के लिए तत्पर होना चाहिए ..!
पूज्य “प्रभुश्री” जी ने कहा – कात्यायनी शक्तिपीठ का विवेचनात्मक. वर्णन देवी भागवत सहित कई अन्य ग्रन्थों में भी है। मान्यता है कि इस मन्दिर क्षेत्र में देवी सती के केश गिरे थे। नवरात्रि के छठे दिन इस मन्दिर में दर्शन करने का विशेष महत्व है। कात्यायनी मन्दिर का इतिहास हजारों साल पुराना है। द्वापर युग की कई कथाएँ इस मन्दिर से भी जुड़ी हैं। भगवान श्रीकृष्ण को पति के रूप में पाने के लिए ब्रज की गोपियों ने माँ कात्यायनी की ही पूजा कालिन्दी यमुना के तट पर की थी। ये ब्रजमण्डल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित हैं। माँ कात्यायनी की पूजा पौराणिक कथाओं के अनुसार, द्वापर युग में जब श्रीकृष्ण अवतार हुआ था, उस समय गोकुल, वृंदावन की गोपियाँ श्रीकृष्ण को पति रूप में पाना चाहती थीं। गोपियों ने अपनी इच्छा पूरी करने के लिए देवी कात्यायनी मन्दिर में विशेष पूजा की थी। माना जाता है कि गोपियों की पूजा से देवी प्रसन्न हुई थीं और उन्होंने मनोकामना पूर्ण होने का वर भी दिया था। इसके कुछ समय बाद एक दिन ब्रह्मा जी ने श्रीकृष्ण की परीक्षा लेने के लिए गोकुल-वृंदावन के सभी ग्वालों का हरण कर लिया और उन्हें अपने ब्रह्मलोक ले गए। श्रीकृष्ण ब्रह्मा जी की योजना समझ गए थे। जब तक सभी ग्वाले ब्रह्मलोक से वापस गोकुल-वृंदावन नहीं आए, तब तक श्रीकृष्ण ग्वालों का रूप धारण करके सभी गोपियों के पति के रूप में उनके साथ रहे थे। इस तरह देवी कात्यायनी ने गोपियों को जो वरदान दिया था, वह पूरा हो गया। श्रीकृष्ण ने ब्रह्मा जी का अहंकार दूर किया और सभी ग्वालों को ब्रह्मलोक से गोकुल-वृंदावन ले आए …।