पूर्व डिप्टी कलेक्टर निशा बोलीं- कांग्रेस ने नौकरी छुड़वाई:टिकट भी नहीं दिया; भाजपा से ऑफर आया तो विचार करूंगी

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निशा बांगरे ने कहा- कांग्रेस ने वादा किया था, फिर एनवक्त पर टिकट बदल दिया। - Dainik Bhaskar

विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए डिप्टी कलेक्टर की नौकरी से इस्तीफा देने वाली निशा बांगरे अब एक बार फिर नौकरी जॉइन करना चाहती हैं। उन्होंने मुख्य सचिव वीरा राणा को पत्र लिखकर इस्तीफा वापस लेने का अनुरोध किया है।

दैनिक भास्कर से बात करते हुए निशा बांगरे ने कहा, ‘कांग्रेस ने मेरी नौकरी छुड़वाई, टिकट भी नहीं दिया। ये मेरे लिए एक धक्का है। मेरे परिवार को लगता है कि मेरे साथ धोखा हुआ है। मुझे भी लगता है कि कहीं न कहीं गलत तो हुआ है। अन्याय हुआ है। अगर समय पर इस्तीफा स्वीकार नहीं करना अन्याय है, तो यह भी एक तरह का अन्याय है। उन्होंने मेरा कॅरियर खराब किया है।’

18 जनवरी को निशा बांगरे ने मुख्य सचिव वीरा राणा को पत्र लिखकर इस्तीफा वापस लेने का अनुरोध किया है।
18 जनवरी को निशा बांगरे ने मुख्य सचिव वीरा राणा को पत्र लिखकर इस्तीफा वापस लेने का अनुरोध किया है।

दरअसल, निशा बांगरे को कांग्रेस ने बैतूल जिले की आमला सीट से विधानसभा चुनाव का टिकट देने का भरोसा दिया था। सरकार से अपना इस्तीफा मंजूर करवाने के लिए निशा बांगरे ने आंदोलन भी किया और कोर्ट की लड़ाई भी लड़ी थी, लेकिन कांग्रेस ने आखिरी मौके पर मनोज मालवे को टिकट दे दिया।

अब निशा बांगरे फिर नौकरी पर लौटना चाहती हैं तो बड़ा सवाल यह है कि राज्य सेवा की नौकरी से इस्तीफा स्वीकार होने के बाद क्या उन्हें वापस लिया जा सकता है? दैनिक भास्कर ने निशा बांगरे के साथ इस मामले में रिटायर्ड अधिकारियों से बात की। सबसे पहले जानिए क्या कह रही हैं निशा बांगरे…

सवाल: आप नौकरी छोड़कर राजनीति में क्यों आईं?

जवाब: मैं जब एमएनसी में इंजीनियर थी तो लगता था कि एयर कंडीशन्ड कमरे में बैठने के लिए मेरा जन्म नहीं हुआ है। मुझे लोगों के बीच जाना है। उनके लिए काम करना है।

जब SDM बनी और आमला में पोस्टिंग हुई तो मुझे लगा कि यही मैं चाहती थी। मैं ऐसे गांवों में पहुंची जहां पहले कोई अधिकारी नहीं पहुंचा था। इस दौरान एक बात मैंने महसूस की कि अधिकारी होने के नाते आपके हाथ बंधे होते हैं, लेकिन राजनीति में आप खुलकर काम कर सकते हैं।

मैं एकदम से राजनीति में नहीं आना चाहती थी। मेरी प्लानिंग थी कि 15-20 साल नौकरी करने के बाद मैं राजनीति जॉइन करती, लेकिन कांग्रेस की तरफ से ही प्रस्ताव मिला कि अगर आप राजनीति में आना चाहती हैं तो आमला से आपको टिकट दिया जा सकता है। जब ऑफर मिला तो उस पर विचार किया।

इस्तीफा देने से पहले निशा बांगरे छतरपुर के लवकुश नगर में SDM के रूप में पदस्थ थीं।
इस्तीफा देने से पहले निशा बांगरे छतरपुर के लवकुश नगर में SDM के रूप में पदस्थ थीं।

सवाल: इस्तीफा तो कांग्रेस के ऑफर से पहले ही दिया था?

जवाब: जब मैंने सर्वधर्म का कार्यक्रम किया, तब सरकार ने उस कार्यक्रम पर रोक लगा दी थी। उस वक्त भी मेरा राजनीति में जाने का कोई इरादा नहीं था। जब मैंने इस्तीफा दिया, सरकार ने इसे नामंजूर किया। तभी मुझे कांग्रेस की तरफ से ऑफर आया था।

कांग्रेस ने मुझे प्रॉमिस किया था कि आमला से टिकट देंगे, लेकिन राजनीतिक कारणों से वे उसे पूरा नहीं कर पाए। हालांकि, आमला सीट पर कांग्रेस ने आखिरी वक्त तक टिकट रोक कर रखा था।

सवाल: तो क्या कांग्रेस ने धोखा दिया?

जवाब: मेरा परिवार जरूर ठगा सा महसूस करता है। हर माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे अच्छी नौकरी करें। डिप्टी कलेक्टर-कलेक्टर जैसे पद पर पहुंचना हर किसी के भाग्य में नहीं होता।

अब कांग्रेस की वजह से नौकरी छोड़ दी और टिकट भी नहीं मिला। ये एक बड़ा शॉक है, दुख की बात तो है। मुझे भी लगता है कि कहीं न कहीं गलत तो हुआ है। अगर समय पर इस्तीफा स्वीकार नहीं करना अन्याय है, तो यह भी एक तरह का अन्याय है। उन्होंने कॅरियर खराब किया ही है।

सवाल: कमलनाथ ने टिकट का वादा किया था, बात कहां अटक गई?

जवाब: मुझे यह समझ नहीं आता कि उनकी क्या मजबूरी थी कि उन्होंने टिकट बदल किया। उन्होंने मंच से ऐलान कर दिया कि मैं चुनाव नहीं लड़ूंगी, जबकि ऐसी कोई बात ही नहीं थी। मैं तो वहीं थी। मैं बाद में भी नौकरी छोड़कर राजनीति में जा सकती थी। मुझे लगता है कि स्थानीय नेताओं का दबाव भी था।

सवाल: ऐसा कब लगा कि नौकरी पर वापस जाना चाहिए?

जवाब: परिवार ने कहा कि चुनाव के नतीजे आ चुके हैं, अब आपको नौकरी में वापस जाना चाहिए। ससुराल पक्ष-मायके पक्ष दोनों ने मुझ पर इसके लिए दबाव बनाया। उसके बाद मैंने 18 जनवरी को ही सेवा में वापस लौटने के लिए आवेदन किया।

तब तक कांग्रेस पार्टी ने कोई जिम्मेदारी भी नहीं दी थी। हमारे प्रदेश अध्यक्ष बदले हुए तो उन्होंने कार्यकारिणी भी भंग कर दी थी। मेरे पास कोई दायित्व भी नहीं था। अब जाकर मुझे मीडिया सेल में जिम्मेदारी दी गई।

जब इस्तीफा स्वीकार नहीं हुआ तो निशा बांगरे ने आमला से भोपाल तक पदयात्रा की थी।
जब इस्तीफा स्वीकार नहीं हुआ तो निशा बांगरे ने आमला से भोपाल तक पदयात्रा की थी।

सवाल: अब आगे क्या करना है?

जवाब: अभी तक मेरे आवेदन पर सरकार का कोई जवाब नहीं मिला है। इस बीच कांग्रेस ने मुझे पार्टी का मुख्य प्रवक्ता बनाया। मैं उस जिम्मेदारी को अभी वहन नहीं कर पा रही थी, क्योंकि मैंने सरकार को आवेदन दे रखा था। अब सब कुछ मुख्यमंत्री जी के हाथ में है।

वे मानवीय आधार पर मौका दे सकते हैं। फिलहाल मैं लोकसभा का भी चुनाव नहीं लड़ पा रही हूं। तो अब मुझे लगता है कि अगर समाज सेवा और राष्ट्र हित में काम करना है तो उस पद पर रहते हुए भी किया जा सकता है।

सवाल: अगर भाजपा से प्रस्ताव मिले तो क्या विचार करेंगी?

जवाब: भाजपा से अभी इस तरह का कोई प्रस्ताव नहीं मिला है, तो इस बारे में कुछ सोचा भी नहीं है। अगर ऐसा कुछ मिलता है तो उस पर सोचूंगी। अभी चुनाव का समय है। मेरे आवेदन पर फैसला तो आचार संहिता खत्म होने के बाद ही हो पाएगा, लेकिन जो भी मुझे करना है उसका फैसला अगले चार-पांच दिनों में हो जाएगा।

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अब जानिए क्या कहते हैं एक्सपर्ट…

एक्सपर्ट बोले- नौकरी वापस मिलने का प्रावधान नहीं
पूर्व प्रशासनिक अधिकारियों और कानून के जानकारों का कहना है कि सेवा कानूनों के तहत निशा बांगरे की वापसी संभव नहीं दिखती। सेवानिवृत्त IAS अधिकारी बी.के.एस. रे का कहना है कि अखिल भारतीय सेवा और राज्य सेवा की शर्तों के मुताबिक स्वेच्छा से इस्तीफा देने और उसके स्वीकार हो जाने के बाद फिर से वापसी संभव नहीं है।

वे कहते हैं कि अगर सरकार ने इस्तीफा स्वीकार नहीं किया होता तो ऐसा किया जा सकता था। ऐसी ही राय मप्र के सामान्य प्रशासन विभाग के प्रमुख सचिव रहे मुक्तेश वार्ष्णेय की है। उनका कहना है कि इस्तीफा मंजूर हो जाने से पहले वापस लेने की अनुमति मिल जाना संभव है, लेकिन इस्तीफा मंजूर हो जाने के बाद सेवा में वापसी नियमों के हिसाब से संभव नहीं है।

एक्सपर्ट ये भी बोले- सरकार चाहे तो वापस बुला सकती है
सेवानिवृत्त अफसरों का कहना है कि नियमों में नौकरी से वापस लेने का प्रावधान नहीं है, लेकिन सरकार चाहे तो वापसी का रास्ता बना सकती है। छत्तीसगढ़ के अतिरिक्त मुख्य सचिव रहे बी.के.एस. रे का कहना है कि राज्य सेवा के किसी अफसर के इस्तीफे के बाद वापसी का एक ही रास्ता हो सकता है।

सरकार ही उनकी नियोक्ता प्राधिकारी है। ऐसे में अगर सरकार चाहे तो राज्य लोक सेवा आयोग से परामर्श के बाद उनको सेवा में ले सकती है। हालांकि, सेवानिवृत्त IAS अधिकारी मुक्तेश वार्ष्णेय कहते हैं कि सरकार भी आउट ऑफ द वे जाकर ही ऐसा करती है। प्रशासनिक विशेषज्ञों का कहना है कि इसके लिए कैबिनेट में प्रस्ताव लाना होगा। कैबिनेट की मंजूरी मिली तो ही सेवा में बहाली हो पाएगी।

शाह फैजल का मामला अभी तक का अपवाद
मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में वरिष्ठ प्रशासनिक पदों पर रह चुके पूर्व अफसर बी.के.एस रे कहते हैं कि उन्हें अभी तक पूरे देश में ऐसा कोई उदाहरण देखने-सुनने को नहीं मिला है, जिसमें इस्तीफे के बाद सेवा में वापसी हुई हो। अगर ऐसा होने लगे तो लोग राजनीति और कारोबार में भाग्य आजमाने सर्विस से इस्तीफा देने लगेंगे।

उन्हें सुविधा होगी कि अगर वे वहां फेल हुए तो कभी भी अखिल भारतीय सेवा अथवा राज्य सेवा की अपनी नौकरी वापस पा जाएंगे। इससे अराजकता बढ़ सकती है। रे कहते हैं कि जम्मू-कश्मीर कैडर के शाह फैजल का मामला अभी तक का अपवाद दिखता है। उनके ख्याल से ऐसा इसलिए संभव हो पाया कि सरकार ने उनके इस्तीफे को पांच साल तक स्वीकार नहीं किया था।

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