☀ प्रभु प्रेमी संघ ? 13 अप्रैल, 2024 (शनिवार)

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पूज्य सद्गुरुदेव आशीषवचनम्
? पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – “सुरासंपूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे ।।”
कूष्माण्डा का अर्थ है – जिनकी ऊष्मा, ऊर्जा और प्रकाश से अनन्त कोटि ब्रह्माण्डों का सृजन व पोषण होता है। अथवा जैसे गर्भवती स्त्री की कोख में उसके शिशु का अस्तित्व पोषित होता है, उसी प्रकार माँ कूष्माण्डा शतकोटि ब्रह्माण्डों को अपने उदर में पोषित करती हैं। वह इस जगत् की आधारभूत शक्ति हैं, उनके तेज से दसों दिशाएँ आलोकित हैं। माँ कूष्माण्डा की कृपा से साधक के रोग और शोक विनष्ट होते हैं तथा उन्हें आयु, विद्या, यश, बल और आरोग्यता की प्राप्ति होती है …! अपने उदर में अनेक ब्रह्माण्डों को धारण करने वाली माँ कूष्माण्डा ही सूर्य की आभा, प्रभा, द्युति व तेज बनकर समस्त जगत को प्रकाशित करती हैं। शाश्वत आह्लाद, ब्रह्मऋता आदि सिद्धियों की संप्राप्ति माँ कूष्माण्डा के आराधन की फलश्रुति है। प्रत्येक प्राणी को सद्-मार्ग पर प्रेरित करने वाली “माँ कूष्माण्डा” सभी के लिए आराध्य हैं। माँ कूष्माण्डा अत्यल्प सेवा और भक्ति से प्रसन्न होने वाली हैं। यदि मनुष्य सच्चे हृदय से इनका शरणागत बन जाए तो फिर उसे अत्यन्त सुगमता से परम पद की प्राप्ति हो सकती है। इनकी उपासना मनुष्य को सहज भाव से भवसागर से पार उतारने के लिए सर्वाधिक सुगम और श्रेयस्कर मार्ग है। माँ कूष्माण्डा की उपासना मनुष्य को आधियों-व्याधियों से सर्वथा विमुक्त करके उसे सुख, समृद्धि और उन्नति की ओर ले जाने वाली है। माँ के तेज और प्रकाश से ही दसों दिशाएँ प्रकाशित हो रही हैं। ब्रह्माण्ड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में अवस्थित तेज इन्हीं की छाया है। दुर्गा सप्तशती के अनुसार देवी कूष्माण्डा इस चराचार जगत की अधिष्ठात्री हैं। कूष्माण्डा का अर्थ है कि जिन्होंने अपनी मंद (पुष्प) सी आनन्दमयता से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को अपने गर्भ में उत्पन्न किया। माना जाता है कि माँ कूष्माण्डा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग-शोक मिट जाते हैं। इनकी भक्ति से आयु, यश, बल और आरोग्य की वृद्धि होती है …।
? पूज्य “प्रभुश्री जी” ने कहा – जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, तब देवी माँ ने ब्रह्माण्ड की रचना की थी। अत: ये ही सृष्टि की आदि-स्वरूपा, आदिशक्ति हैं। इनका निवास सूर्यमण्डल के भीतर के लोक में है। वहाँ निवास कर सकने की क्षमता और शक्ति केवल इन्हीं में है। इनके शरीर की कान्ति और प्रभा भी सूर्य के समान ही दैदीप्यमान हैं। महापुरुषों के अनुसार माँ की उपासना भवसागर से पार उतारने के लिए सर्वाधिक सुगम और श्रेयष्कर मार्ग माना जाता है। जैसा कि दुर्गा सप्तशती के कवच में भी लिखा गया है कि – “कुत्सित: कूष्मा कूष्मा-त्रिविधतापयुत: संसार: स अण्डे मांसपेश्यामुदररूपायां यस्या: सा कूष्माण्डा ।।” अर्थात् वह देवी जिनके उदर में त्रिविध तापयुक्त संसार स्थित है वह “कूष्माण्डा” हैं। देवी कूष्माण्डा इस चराचार जगत की अधिष्ठात्री हैं। सुख, समृद्धि, उन्नति और अपूर्व शान्ति की ओर ले जाने वाली है – माँ की आराधना। अत: अपनी लौकिक, पारलौकिक उन्नति चाहने वालों को इनकी उपासना में सदैव तत्पर रहना चाहिए। आराध्य का स्मरण ही सुमिरन है और सुमिरन आराध्य के प्रति श्रद्धानिष्ठ बनने की सतत् प्रक्रिया है। इस आराधन प्रक्रिया को जो जितने मनोयोग से करता है, वह उतने ही आत्म-संतोष की अनुभूति करता है। आत्म-संतोष की यह संजीवनी उसे तनावमुक्त रखने के साथ शान्त-सुखद जीवन जीने और कार्यक्षेत्र में सफल होने की ऊर्जा प्रदान करती है …।

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