पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – “अभयं सत्त्वसंशुद्धिः ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ।।”
अभयता मनुष्य जीवन की श्रेष्ठ उपलब्धि है। प्रायः भय का प्रमुख कारण हमारे भीतर का अवसाद और अज्ञान ही है। सत्व के ज्ञान और सद्विचारों के प्रकाश से ही जीवन में भयमुक्त अवस्था की भूमिका तैयार होती है। सकारात्मक परिवेश में रहकर सद्ग्रन्थों का अध्ययन और जीवन मुक्त महापुरुषों की नित्य सन्निधि ही हमारे हृदय में अवस्थित अज्ञान जन्य विकारों का शमन कर परम लक्ष्य की संसिद्धि में सहायक है ..! सन्तों का दर्शन-सान्निध्य त्रिविध तापों का शमन करने वाला और इहलौकिक-पारलौकिक प्रयोजनों की सिद्धि करने वाला है। बसंत जब जीवन में आता है तभी जीवन में सन्त आते हैं। बसंत के आने से प्रकृति हर्षित होती है और सन्त के आने से संस्कृति। कई जन्मों के पुण्य उदय होते हैं तब कभी सन्त जीवन में आते हैं। सन्त किसी जाति या वर्ग विशेष के नहीं, अपितु पूरे समाज के होते हैं। सन्तों का दर्शन और चिन्तन सम्पूर्ण मानव जाति के कल्याण तथा समाज में मानवता का मार्ग प्रशस्त करता है। साधु-सन्तों ने सत्पुरुषों ने भारत के कण-कण में धर्म को स्थापित किया। इसलिए शरीर में जो महत्व प्राण का है वही महत्व राष्ट्र में धर्म का है। यदि धर्म चला गया तो जैसी स्थिति प्राण के बिना शरीर की होती है, वैसी ही राष्ट्र की हो जायेगी। पूज्य “प्रभुश्री” जी ने कहा कि साधु-सन्तों, तीर्थंकरों, आचार्याें और मुनियों ने सदियों से इस धर्मध्वजा को भारत में ही नहीं, बल्कि विश्वभर में फहराया है। उन्होंने सत्य की खोज कर उसे अपने जीवन में उतार लिया, इसीलिए वे तीर्थंकर कहलाए। जिस सभा में सन्त उपस्थित होते हैं, उसमें सम्पूर्ण भारत के दर्शन होते हैं, क्योंकि संसार में भारत ऐसा देश है जिसे किसी राजा ने नहीं, बल्कि सन्तों ने बनाया है। प्रत्येक व्यक्ति को सन्तों एवं शास्त्रों का सदा अनुसरण करना चाहिए। इसी में मानव जीवन की सार्थकता है। सन्त तो लोक कल्याणार्थ पृथ्वी पर तीर्थ रूप होकर विचरण करते हैं। शास्त्र हमारे नेत्र हैं। हमें एकनिष्ठ होकर शास्त्र व गुरु की वाणी का पालन करना चाहिए। ऐसा जीवन जीयें कि लोग हमारा अनुसरण करें …।
पूज्य “प्रभुश्री” जी ने कहा – संसार के समस्त जीवों सहित मानव के उद्धार के लिए ही सन्तों का इस धरा पर अवतरण होता है। सन्तों का दर्शन तथा प्रवचन कल्याणकारी है, सौभाग्यशाली मानव को ही उपलब्ध हो पाता है। सत्संग के प्रभाव से ही मनुष्य को सद्ज्ञान की प्राप्ति होती है। सन्तों के दर्शन से कष्ट दूर होते हैं, भय समाप्त हो जाता है। मनुष्य को सदा अपने स्वभाव में रहना चाहिए। स्वार्थ एवं अभिमान इन दो बातों से व्यक्ति का स्वभाव बिगड़ जाता है। इसलिए स्वार्थ एवं अभिमान का सर्वथा त्याग कर देना चाहिए। मानव जीवन का लक्ष्य अपने स्वभाव को शुद्ध बनाना ही होना चाहिए, इसी से उन्नति होती है। जिसके हृदय में अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, ईर्ष्या जैसे अवगुण विराजमान हैं, उस हृदय में परमात्मा वास नहीं करते। वह तो शुद्ध चैतन्य आत्मा रूपी समुद्र में ही निवास करते हैं। प्रभु का सेवक बनने में जो सुख है, वह सुख किसी कार्य में नहीं है। इसलिए भगवान के चरणों के दास बनें, स्वामी बनने में कभी सुख मिल ही नहीं सकता। दुनिया की हर चीज मिथ्या है, यदि संसार में कोई सत्य है तो वह है – मृत्यु। पूज्य “प्रभुश्री” जी ने सन्तों की महिमा का बखान करते हुए कहा कि तीर्थ अचल होते हैं, किन्तु सन्त सचल होते हैं। वे सबमें केवल राम और कृष्ण को ही देखते हैं। उन्हें किसी से कुछ लेना-देना नहीं। बिना सन्तों की सान्निध्य के सब बेकार है। सन्त तो भगवान के प्रिय हैं और जो भगवान के प्रिय हैं, वो सबके प्रिय हैं। इनके दर्शन मात्र से सारे कष्ट नष्ट हो जाते हैं। तभी तो युग द्रष्टा सन्त कबीर जी कहते हैं – “एक घड़ी आधो घड़ी , आधो हुं सो आध। कबीर संगति साधु की, कटै कोटि अपराध …”। एक क्षण, आध क्षण, आधे का भी आधा क्षण के लिये यदि साधु-सन्तों की संगति की जाये तो हमारे करोड़ों अपराध-पाप का तत्काल नाश हो जाते हैं। जी हाँ, सन्त ही इस राष्ट्र के मेरुदण्ड हैं, जिस पर सारा राष्ट्र टिका हुआ है। सन्त-सत्पुरुषों का वैराग्य ऐसा पक्का होता है कि जीवन में आने वाली ब़डी से ब़डी बाधाएँ, विपदाएँ आने पर भी वे घबराते नहीं हैं और अपने पन्थ को नहीं छो़डते। एक महापुरुष का जीवन और आचरण नारियल की तरह होता है, जो ऊपर से कड़े परन्तु, अन्दर से कोमल, सुन्दर व मधुर गुणकारी होता है। इसी प्रकार एक सच्चा सन्त जब किसी जीव को दु:ख व दुविधा में देखता है तो उसका दु:ख द्रवित हो जाता है। सरोवर, वृक्ष, सन्त और मेघ यह चारों सदैव परोपकार के लिए जीते हैं। सन्तों को तीर्थ से भी बढ़कर बताया गया है। तीर्थस्थान पर जाने से फल की प्राप्ति होती है, लेकिन सन्तों के दर्शन मात्र से ही आत्म-कल्याण हो जाता है …।