☀ प्रभु प्रेमी संघ ? 05 अप्रैल, 2024 (शुक्रवार)

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पूज्य सद्गुरुदेव आशीषवचनम्
? पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – चरित्र जीवन की सबसे मूल्यवान निधि है, जो ज्ञान, तप, शील और सद्गुणों से उन्नत होती है। शुभ चिन्तन और तदानुकुल आचरण हमारे चरित्र को पुष्पित और पल्लवित करते हैं। जीवन की सार्थकता इसी में है कि चरित्र दृष्टान्त, गाथा और उदाहरण बन जाए …। चरित्र मानव जीवन की स्थाई निधि है। उज्ज्वल चरित्र मानव जीवन की सर्वश्रेष्ठ सम्पदा है। भारत के महान विचारक और युगप्रवर्तक स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा था कि न तो धन का मूल्य है, न ही नाम और यश का। यदि कोई दृढ़ चरित्र है तो उसे कोई अमर होने से नहीं रोक सकता। जो अपनी इच्छाओं को नियंत्रित रखते हैं और उन्हें सत्कर्मों का रूप देते हैं उन्हीं को चरित्रवान कहा जा सकता है। संयत इच्छाशक्ति से प्रेरित सदाचार का नाम ही चरित्र है। उत्तम चरित्र सर्वत्र ग्राह्य और वन्दनीय है। अत: साहसी, नैतिक और चरित्रवान रहें। चरित्र सबसे मूल्यवान वस्तु है, जो ज्ञान, तप, शील और सद्गुणों से उन्नत होता है। अच्छे आचरण से ही जीवन में संयम आता है। इसलिए साधक अपने आचरण को पुष्प की तरह निर्मित करे। फूल को तो पता नहीं है कि उसमें गन्ध है, सुगन्ध है, मकरंद है, उसमें कोई आकर्षण है। वह तो अचानक ही जान पाता है कि ये हो क्या रहा है? ये तितलियाँ क्यों मेरे आस-पास मंडरा रही हैं। ये भ्रमर क्यों मेरे पास आ रहे हैं? उसे तो कभी पता नहीं लगता कि मधुमक्खियाँ उसमें से मधु अपहृत कर के ले गईं। उस बावरे फूल को तो ये भी नहीं पता कि उसमें शहद भी है? इतना निर्दोष, इतना सरल, इतना नैसर्गिक, इतना प्राकृतिक है – फूल। ये बड़प्पन है। जहाँ बड़प्पन होगा, वहीं श्रेष्ठता होगी। अत: जहाँ पूजिता, पवित्रता होगी, वैदुष्य विचार होगा, वहाँ मार्केटिंग नहीं होगी। चरित्रवान व्यक्तियों पर ही दैव्य वरदान बरसते हैं। सिद्धि, तृप्ति, संतुष्टि एवं शान्ति जैसी दिव्य विभूतियों से मात्र चरित्रवान ही सम्पन्न होते हैं। सद्भावना, शालीनता एवं सुसंस्कारिता के सभी लक्षण चरित्रवान व्यक्तियों में ही उभरे हुए दिखते हैं। अत: जिन्होंने जीवन को साध लिया हो, वे साधारण एवं सामान्य परिस्थितियों में रहते हुए भी महामानव व देवमानव बन जाते हैं। अतः इतिहास इस कथन एवं तथ्य का साक्षी है …।
? पूज्य “प्रभुश्री ” जी ने कहा – यह संसार रंगमंच ही है, जिसमें ईश्वर प्रदत्त अपनी भूमिका में चरित्र के उच्चतम व दिव्यतम प्रतिमानों का निर्वहन ही जीवन सिद्धि है। मन, वचन और कर्म के संतुलन से संवरता है – मनुष्य का जीवन। व्यक्तित्व का विकास चरित्र से होता है और चरित्र से ही मनुष्य की पहचान होती है। इसलिए चरित्र-निर्माण सबके लिए महत्त्वपूर्ण है। शिक्षक स्वयं चरित्रवान होना चाहिए। शिक्षक की स्पष्टता और उसकी सत्यता ही व्यवहारिक (Practical Knowledge) रूप से छात्रों को सीखने हेतु प्रेरित करती है। शिक्षा भावात्मक होनी चाहिए, जिससे स्वाभिमान और श्रद्धा का भाव जागे। केवल किताबें पढ़ लेने से कोई लाभ नहीं है। हमें ऐसी शिक्षा की आवश्यकता है, जिसमें चरित्र का निर्माण हो। चरित्र एक पात्र है, जिसमें चिन्तन विकसित होता है। चरित्र के अभाव में चिन्तन ढल जाता है, गल जाता है, परन्तु सबल चरित्र के साथ चिन्तन का प्राखर्य तीक्ष्णता बढ़ती जाती है। चिन्तन में धार एवं व्यवहार में सुगन्ध चरित्र से फलीभूत होती है। चरित्र की उपजाऊ भूमि पर ही आध्यात्मिक गुणों का बीजारोपण होता है। अध्यात्म की पात्रता है – चरित्रवान होना। चरित्ररूपी मजबूत पात्र ही आध्यात्मिक शक्तियों को ग्रहण एवं धारण कर सकने में समर्थ होता है। आध्यात्मिकता का किसी भी धर्म, पंथ, सम्प्रदाय, जाति और लिंग जैसे भेद करने और करवाने वाले तत्वों से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है। उसका सहज स्वरूप तो किसी भी देश और काल से बड़ा है, वह शब्दातीत और भावातीत दोनों ही है। उससे उठने वाली वास्तविक ध्वनि की अनुगूँज विनम्रता और समता से परिपूर्ण सार्वभौमिक है, जिसका संवाद और सौन्दर्य सभी प्राणियों के लिए एक जैसा ही है। उसमें आपसी समन्वय के बोध को भरपूर जी लेने की यथार्थ अनुभूति व्याप्त है …।
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