
पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – चरित्र जीवन की सबसे मूल्यवान निधि है, जो ज्ञान, तप, शील और सद्गुणों से उन्नत होती है। शुभ चिन्तन और तदानुकुल आचरण हमारे चरित्र को पुष्पित और पल्लवित करते हैं। जीवन की सार्थकता इसी में है कि चरित्र दृष्टान्त, गाथा और उदाहरण बन जाए …। चरित्र मानव जीवन की स्थाई निधि है। उज्ज्वल चरित्र मानव जीवन की सर्वश्रेष्ठ सम्पदा है। भारत के महान विचारक और युगप्रवर्तक स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा था कि न तो धन का मूल्य है, न ही नाम और यश का। यदि कोई दृढ़ चरित्र है तो उसे कोई अमर होने से नहीं रोक सकता। जो अपनी इच्छाओं को नियंत्रित रखते हैं और उन्हें सत्कर्मों का रूप देते हैं उन्हीं को चरित्रवान कहा जा सकता है। संयत इच्छाशक्ति से प्रेरित सदाचार का नाम ही चरित्र है। उत्तम चरित्र सर्वत्र ग्राह्य और वन्दनीय है। अत: साहसी, नैतिक और चरित्रवान रहें। चरित्र सबसे मूल्यवान वस्तु है, जो ज्ञान, तप, शील और सद्गुणों से उन्नत होता है। अच्छे आचरण से ही जीवन में संयम आता है। इसलिए साधक अपने आचरण को पुष्प की तरह निर्मित करे। फूल को तो पता नहीं है कि उसमें गन्ध है, सुगन्ध है, मकरंद है, उसमें कोई आकर्षण है। वह तो अचानक ही जान पाता है कि ये हो क्या रहा है? ये तितलियाँ क्यों मेरे आस-पास मंडरा रही हैं। ये भ्रमर क्यों मेरे पास आ रहे हैं? उसे तो कभी पता नहीं लगता कि मधुमक्खियाँ उसमें से मधु अपहृत कर के ले गईं। उस बावरे फूल को तो ये भी नहीं पता कि उसमें शहद भी है? इतना निर्दोष, इतना सरल, इतना नैसर्गिक, इतना प्राकृतिक है – फूल। ये बड़प्पन है। जहाँ बड़प्पन होगा, वहीं श्रेष्ठता होगी। अत: जहाँ पूजिता, पवित्रता होगी, वैदुष्य विचार होगा, वहाँ मार्केटिंग नहीं होगी। चरित्रवान व्यक्तियों पर ही दैव्य वरदान बरसते हैं। सिद्धि, तृप्ति, संतुष्टि एवं शान्ति जैसी दिव्य विभूतियों से मात्र चरित्रवान ही सम्पन्न होते हैं। सद्भावना, शालीनता एवं सुसंस्कारिता के सभी लक्षण चरित्रवान व्यक्तियों में ही उभरे हुए दिखते हैं। अत: जिन्होंने जीवन को साध लिया हो, वे साधारण एवं सामान्य परिस्थितियों में रहते हुए भी महामानव व देवमानव बन जाते हैं। अतः इतिहास इस कथन एवं तथ्य का साक्षी है …।