पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – भारत की कालजयी सनातन वैदिक संस्कृति प्रकृति के साथ नित्य एकीकृत व प्रत्येक सन्दर्भ में नित्य-नूतन और समीचीन है।
पाश्चात्य जगत् स्वाध्याय और आध्यात्मिक दृष्टि के अभाव में न केवल भारतवर्ष की सांस्कृतिक दिव्यता से अपरिचित है, अपितु दुर्भावनावश इन दिव्य और लोकोपकारी जीवन मूल्यों के सन्दर्भ में सुनियोजित दुष्प्रचार में भी संलग्न रहा है। पश्चिम की सोच में असीमित भोग वाँछाएँ और श्रेष्ठता का दंभ है। मैं ही श्रेष्ठ हूँ। मेरी मान्यताएँ और परम्पराएँ श्रेष्ठ हैं, इसलिए इस वसुधा के सम्पूर्ण वैभव का एकमात्र भोक्ता मैं ही हूँ- ऐसे विचार समष्टि के लिए हितकर नहीं हैं। हिन्दू वैदिक संस्कृति सम्पूर्ण विश्व को अपना परिवार मानती है, इसलिए “संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्” जैसे दिव्य भावों की चिरकाल से उद्घोषक रही है। पश्चिमात्य दार्शनिक, इतिहासकार अथवा वैज्ञानिकों की प्राथमिकताएँ केवल भौतिकीय अथवा इन्द्रिय-जन्य सुखों पर केन्द्रित है, जबकि भारतीय चिन्तन का मूल आधार परमार्थ और यथार्थ बोध है, निस्वार्थ समाज सेवा ही ईश्वर सेवा है। निस्वार्थ सेवा, भगवद-भजन, करुणापूरित, अन्तःकरण शास्त्र सम्मत जीवनशैली और सद्गुरुदेव-वचन विश्वास सिद्धिकारक है। निस्वार्थ सेवा ही धर्म है। मुक्ति केवल उसके लिए है, जो दूसरों के लिए सर्वस्व त्याग देता है, पश्चिम के लिए पूरा संसार ही बाजार है, जिससे लाभ लेना है। किन्तु भारतीय संस्कृति में पूरा विश्व एक परिवार है, जिसको लाभ देना है। दुर्भाग्य से आज हम उपभोक्तावादी संस्कृति का हिस्सा बनने लगे हैं, इसीलिए समाज में भय, चिन्ता, उन्माद आदि दृष्टिगोचर हो रहा है। भारतीय संस्कृति के मूल में त्याग है। जो हमारे पास है, वो सिर्फ हमारे लिए ही नहीं है, बल्कि दूसरों के लिए भी है। ये भावना मन में रहे तो समाज में आज दिखाई दे रहे कई दुर्गुण स्वयं समाप्त हो जायेंगे। पश्चिम में हर दूसरा व्यक्ति मनोरोग की तरफ जा रहा है। हम भारतवासी धन्य हैं कि हमारा जन्म ऐसी धरती पर हुआ है, जहाँ अध्यात्म हमें सम्भाल कर रखता है। भारतीय संस्कृति विश्व की अनुपम संस्कृति है और हमें किसी भी परिस्थिति में इसे बचाकर, सजाकर रखना है। एक संन्यासी होने के नाते मैं यह जानकर प्रसन्न हूँ कि वर्तमान में हमारा शीर्ष नेतृत्व उसी वैदिक परम्परा और औदार्य भाव की युगानुकूल अभिव्यक्ति सी प्रतीति करा रहा है। वर्तमान युग के समय में आत्म-शक्ति और आध्यात्मिक अंत:करण सम्पन्न नेतृत्व ही विश्वभर में आशाओं के सूर्य उगा सकता है …।
पूज्य “प्रभुश्री” जी ने कहा – आध्यात्मिक प्रक्रिया एक यात्रा की तरह है – निरन्तर परिवर्तन। हम राह की हर चीज से प्रेम करना और उसका आनन्द लेना सीखते हैं, पर उसे उठाते नहीं। आध्यात्मिकता मूल रूप से मनुष्य की मुक्ति के लिये है, अपनी चरम क्षमता में खिलने के लिये है। यह किसी मत या अवधारणा से अपनी पहचान बनाने के लिये नहीं है। आध्यात्मिकता का अर्थ है कि अपने विकास की प्रक्रिया को अत्यन्त तीव्र करना। यदि आप अपने ऊपर बाहरी परिस्थितियों का असर नहीं होने देते हैं तो आप स्वाभाविक रूप से आध्यात्मिक हैं। आध्यात्मिक मार्ग पर चलने का अर्थ है कि आप मुक्ति की और बढ़ रहे हैं, चाहे आपकी पूर्वकालीन प्रवृत्तियाँ, आपकी देह और आपके जीन्स कैसे भी हों। अस्तित्व में एकात्मकता व एकरूपता है और हर मनुष्य अपने आप में अनूठा है। इसे पहचानना और इसका आनन्द लेना ही आध्यात्मिकता का सार है। भारतीय संस्कृति में भी कर्म को ही प्रधानता दी गई है। इसीलिए उन्हीं महापुरुषों को पूजा गया है, जिन्होंने भावना से ऊपर उठकर कर्तव्य को प्रधानता दी है। महर्षि वेदव्यास ने तो यह स्पष्ट कहा है कि यह धरती हमारे कर्मों की भूमि है। कर्तव्य मनुष्य के सम्बन्धों और बन्धु-बांधवों व मित्रजनों से ऊपर होता है। अतः ईश्वर की इच्छा के अनुसार चलना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है। पूज्य “प्रभुश्री” जी ने कहा कि भारत की यह कालजयी, मृत्युंजयी सनातन आर्य, वैदिक, हिन्दू धर्म संस्कृति की सभ्यता, संस्कार और संवेदनाएँ अत्यन्त प्राचीन हैं। जबसे भी मानवीय सभ्यता है, जबसे भी धरती, अम्बर, अग्नि, जल, वायु, निहारिकाएँ और नक्षत्र हैं। अथवा यहाँ जैव-जगत् और प्राणियों का अस्तित्व है, तबसे ही हिन्दू संस्कृति है। हमारी संस्कृति को परिभाषित करते हुए कहा जा सकता है कि ये अर्पण, तर्पण और समर्पण की संस्कृति है। हम सर्वस्व अपना समर्पण करने वाले प्राणी हैं, विशेषकर समाज के लिए। और, हमारी जो प्रवृत्तियाँ भी है वह पारमार्थिक प्रवृत्तियाँ है। जब व्यक्ति में पारमार्थिक प्रवृत्तियाँ जाग्रत होती हैं तब वह व्यक्ति मात्र मनुष्य ही नही, अपितु संस्था अथवा सिद्धान्त बन जाता है। जैसे ही आप सेवा के लिए प्रस्तुत होते हैं, तब आप अनन्त हो जाते हैं। सेवा भारतीय संस्कृति की अत्यन्त सुदीर्घ अभिव्यक्ति है। हमारे पास जो कुछ भी है उनमें सबके अंश भी समाहित है। वृक्ष, धरती, अम्बर, अग्नि, जल, पवन प्रकाशादि के रूप में परमात्मा स्वयं भी सेवा और पारमार्थिक कार्यों में ही संलग्न है …।