औपनिवेशिक रेखाओं से विभाजित भारतीय उपमहाद्वीप की बढ़ती सामरिक चुनौतियां

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औपनिवेशिक रेखाओं से विभाजित भारतीय उपमहाद्वीप की बढ़ती सामरिक चुनौतियां

डॉ गिरिजा किशोर पाठक
अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति विशेषज्ञ

ऐतिहासिक रूप से भारतीय उपमहाद्वीप में सभ्यता, संस्कृति,जलवायु, प्राकृतिक संसाधनों के बीच भौगौलिक संवद्धता का बहुआयामी एकल रूप देखने को मिलता है। सांस्कृतिक रुप से भी इसे ‘जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे आर्यावर्ते.’यानिकि इसे जम्बूद्वीप (एशिया ) का एक बृहद खंड कहा गया था। इस विशाल भूखण्ड भारतवर्ष का सांस्कृतिक विस्तार पारस (ईरान), अफगानिस्तान, पाकिस्तान, हिन्दुस्थान,नेपाल, तिब्बत, भूटान, म्यांमार, श्रीलंका, मालद्वीप, थाईलैंड, मलेशिया, इंडोनेशिया, कम्बोडिया, वियतनाम, लाओस तक था। शैने -शैने आक्रान्ताओं के साथ इस भू भाग में नये नये संप्रदाय , नयी- नयी भाषा और बहुल संस्कृतियों का अभ्युदय हुआ। कालांतर में अंग्रेजों ने इस भू भाग को सामरिक और सांप्रदायिक आधार पर रेडक्लिफ लाइन, डूरैण्ड लाइन, मैकमोहन लाइन खीच कर अफगानिस्तान, वर्मा , श्रीलंका , पाकिस्तान जैसे टुकड़ों में बाट दिया. भारत पाकिस्तान के बीच की रेडक्लिफ लाइन 1972 के शिमला समझौते के बाद 3223 किमी.की नियंत्रण रेखा है। भारत चीन के बीच 1914 में निर्धारित मैकमोहन लाइन जिसे चीन नहीं मानता यह 3488 किमी की वास्तविक नियंत्रण रेखा LOC, है। भारत और अफगानिस्तान के बीच डूरन्ड रेखा अब 106किमी की बची है शेष 2430 किमी॰ लम्बी अन्तराष्ट्रीय सीमा अफगानिस्तान और पाकिस्तान की सीमा निर्धारित करती है। इसके साथ ही नेपाल से 1717 , भूटान 699, म्यांमार 1643, बंगलादेश 4156 किमी. की सीमा रेखा भारत को इन देशों से अलग करती हें. श्रीलंका ,मालदीव , इंडोनेशिया हिंद महासागर और अरब सागर के साथ 7516.6 कि मी. की तटीय सीमा है। ‌भू सामरिक और आर्थिक रुप से दक्षिण एशिया के सभी राष्ट एक दूसरे के पूरक हो सकते थे। लेकिन ब्रिटिश बटवारे और आजादी के साथ भौगोलिक, आर्थिक और साम्प्रदायिक कारणों से इनके बीच कलह प्रारम्भ हो गए. तत्कालीन शीत युद्ध, विश्व का द्विध्रुवीकरण और भारतीय उपमहाद्वीप में कुछ महाशक्तियों के हित निहित होने के कारण यह क्षेत्र शान्ति, सदभाव और समृद्धि हासिल नहीं कर सका। इस उप महा द्वीप के अनेक देशों में लोकतंत्र भी मजबूती से उभर नहीं पाया . भारत ने धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र का रास्ता अपनाया तो क्षेत्र में अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बंगलादेश, मालदीव इस्लामिक रिपब्लिक की राह पर चलने लगे। पाकिस्तान का लोकतंत्र जहाँ सैनिक शासकों की कठपुतली बना रहा अफगानिस्तान की सत्ता 42 साल रुस और अमेरिका के हितों की भूसामरिक प्रतिस्पर्धा के बाद खूखार आतकंवादी संगठन तालिबान के हाथ चला गया। म्यांमार सैनिक सत्ता के हाथ में है।
समुद्री सीमा से लगे मालदीव में 2018 में राष्ट्रपति उम्मीदवार अब्दुल्ला यामीन ने हार के बाद इंडिया आउट का नारा दिया जो 2023 को में सफल हो गया। नवंबर 23 में सत्ता परिवर्तन के साथ भारत विरोधी राष्ट्रपति मोह. मुइज्जू सत्ता सत्ता में आ गये। मुइज्जू ने पहली यात्रा तुर्की की की फिर चीन की। राष्ट्रपति मुइज्जू भारत की सैन्य उपस्थिति को हटाने और आत्मनिर्भरता में सुधार करने का जनादेश मिलनेकी बात कही ।रडार सिस्टम को संचालित करने वाले 88 भारतीय सैनिक, 2 हालिकैप्टर सबको 10 मई तक मालदीव से हटाने का निर्णय लिया. चीनी पोत शियांग यांग हो -3 को मालदीव में रहने की अनुमति दी।

लक्षद्वीप में 3 जनवरी की भारत के प्रधानमंत्री की यात्रा पर उनके 3 मंत्रियों की टिप्पणी ने द्विपक्षीय संबन्धों में खटास पैदा की.
राष्ट्रपति मोह. मुइज्जू ने मालदीव की संप्रभुता की दुहाई देकर चीन की यात्रा की सारे सामरिक समझौते चीन से किये। यहाँ तक की चीन को 34 द्वीपों की निगरानी और पर्यटन विकास का समझौता बात सामने आई हे. तुर्की से भारतीय सुरक्षा व्यवस्था के पृथक समुद्री सीमा की पेट्रोलिंग के लिए द्रोण खरीद लिए। मालदीव भारत का निकटस्थ पड़ोसी है। इस तरह मालदीव चीन के स्ट्रिंग आफ पर्ल्स नीति का उपकरण बन गया। आज राष्ट्रपति मोह. मुइज्जू द्वारा भारत के विरूद्ध चीन, तुर्की , पाकिस्तान की धुरी बनाना भी भारतीय तटीय सुरक्षा के लिए एक नयी चुनौती है। इसके गंभीर राजनीतिक, आर्थिक, सुरक्षा, भू-राजनीतिक और भू-रणनीतिक परिणाम हो सकते हैं।
जिस पाकिस्तान ने रेडक्लिफ लाइन का हमेशा उलंधन किया और 90 के दशक में भारत में कश्मीर की आजादी के नारों के साथ जिहादियों और आतंकियों को प्रशिक्षण, समर्थन दिया घुसपैठ कराकर कत्लेआम कराया, जो पाकिस्तान अफगानिस्तान के आतंकी संगठन तालिबान का सिपहसालार होता था आज वही पाकिस्तान तालिबान के एक धड़े तहरीके तालिबान इन पाकिस्तान के आतंक से तोरखम सीमा पर जूझ रहा है। तालिबान अफगानिस्तान को पाकिस्तान (आईएसआई) की कालोनी नहीं बनना चाहता , दूसरा वह पाकिस्तान को पूर्ण इस्लामिक स्टेट नहीं मानता; तीसरा वह डूरण्ड लाइन को भी नहीं मानता। तालिबान और पाकिस्तान का संधर्ष जारी रहने की संभावना है। पाकिस्तान में अभी आर्मी समर्थित जोड़ तोड़ की कमजोर सरकार चल रही है । चीन की पाकिस्तान में सिपेक ( CPEC) के माध्यम से प्रविष्टि है तो अफगानिस्तान के विशाल खनिज भंडारों पर भी चीन कि नजर है. दोनों के संघर्ष में चीन तटस्थ रहेगा. इस शेत्र में भी चीन का मुख्य लक्ष भारत के सामरिक हितों को कमजोर करना है.
म्यानमार से भी भारत की सीमा समस्या है। रोहिंग्या मुसलमानों, कूकी विद्रोहियों की घुसपैठ तथा चीन द्वारा पूर्वोत्तर राज्यों के उग्रवादियों को हथियारों की सप्लाई का यह गेट वे है। ऐग्लो- नेपाल युद्ध के बाद 1814 की सिंरौली की संधि से भारत नेपाल के मध्य सीमा का निर्धारण काली नदी से किया गया था. लेकिन नेपाल में भी राजनीतिक अस्थिरता चल रही है चीन समर्थित सरकार बन जाने पर सीमा विवाद और क्षेत्र में कब्जे जैसी घटनायें आम तौर पर देखने को मिलती है। पूर्व प्रधान मंत्री ओली ने लीपूलेक सड़क का विरोध ही नहीं किया अयोध्या को भी जनकपुर में ही बताया. कूटनीति के जानकार इसे भी चीन के टूल किट के रूप में ओली का कार्य बताते हैं. उधर श्री लंका आर्थिक बदहाली के दौर से गुजर रहा है लेकिन लंका द्वारा चीन को हंबनटोटा बंदरगाह को लीज पर दिये जाने के कारण भारत के विरुद्ध हिन्द महासागर में चीन की स्ट्रींग आफ पर्ल्स नीति को एक अड्डा मिला है।
ऐतिहासिक कारणों से भारतीय उप महाद्वीप में कुछ न कुछ सीमा रेखाओं का विवाद हर एक देश का दूसरे देश के साथ है लेकिन चीन हर विवाद को अपने सिल्क रूट, सीपेक, स्ट्रिंग आफ पर्लस नीति के तहत भारत के विरूद्ध उपकरण बनाना चाहता है। पाकिस्तान दशकों से और अब मालदीव इस मुहीम में चीन के साथ खड़ा है। चीन ने तालिबानी शासन को मान्यता दी है। जीबूती, बंगलादेश , श्रीलंका, म्यांमार और अब मालदीव के बंदरगाहों पर अधिपत्य कर भारत के अन्तर्राष्ट्रीय हितों को प्रभावित करना चाहता है। इस्लामिक रिपब्लिक पाकिस्तान , अफगानिस्तान, बाग्लादेश और मालदीव के भीतर अनेक संगठन भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को इस्लाम विरोधी बताते हैं. चीन के लिए इनको हवा देना सरल है. चीन समय समय पर मेकमोहन लाइन को अमान्य करते हुए लद्दाख़ और अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर भूसामरिक दबाव, की कूटनीति चलाता है। अरुणाचल के 90 हजार वर्ग किमी पर चीन अपना दावा करता है और 6 दशक से लद्दाख के 38 हजार वर्ग किलोमीटर भूभाग पर कब्ज़ा जमाये है. पाकिस्तान उसका नेचूरल एलाई है जिसने 1963 में उसने 5 हजार 180 वर्ग किलोमीटर कि जमीं चीन को सौप दी और चीन ने उसी पर अपने सिल्क रूट का विस्तार कर सीपेक और कर्राकोरम हाई वे बना डाला.
भारत ने प्रत्युत्तर में सामरिक रणनीति नेकलेस आफ डाइमंड अपनायी है जिसके तहत सिंगापुर, इंडोनेशिया, तजाकिस्तान, मंगोलिया और इरान के साथ सामरिक समझौते किये है।
सीमा रेखाओं की सामरिक आर्थिक चुनौती कल भी थी आज भी है भारत एक समर्थ देश है । उम्मीद की जानी चाहिए कि चीन की आर्थिक कूटनीति से दिवालिया होते छोटे छोटे कमजोर देश अपनी संप्रभुता के लिए एक दिन मुक्ति का बिगुल जरूर बजायेंगे।

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