राहुल गांधी की कमजोरी
राहुल गांधी ने एक बार फिर यह सिद्ध किया कि वह अपनी गलतियों से कभी सबक नहीं सीखते। इस बार उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर प्रहार करने के लिए कहा कि हिंदू धर्म में एक शब्द है शक्ति और हम उससे ही लड़ रहे हैं। इसमें संदेह नहीं कि वह नरेन्द्र मोदी से पूरी आक्रामकता के साथ राजनीतिक लड़ाई लड़ रहे हैं, लेकिन समझना कठिन है कि सत्ता की शक्ति का मुकाबला करने के लिए उन्हें यह कहने की क्या आवश्यकता थी कि हिंदू धर्म में एक शब्द है शक्ति…।
आखिर उन्हें हिंदू धर्म का उल्लेख करने की क्या जरूरत थी? यदि वह शिवभक्त हैं और यह दावा करते हैं कि उन्होंने हिंदू धर्म के शास्त्रों का अध्ययन किया है, तो फिर उन्हें इतनी साधारण सी बात तो पता होनी ही चाहिए कि हिंदू धर्म में शक्ति की क्या मान्यता और महत्व है? उन्हें सत्ता की शक्ति और हिंदू धर्म की शक्ति में अंतर करना तो आना ही चाहिए। इस पर आश्चर्य नहीं कि प्रधानमंत्री मोदी ने राहुल गांधी के अनावश्यक वक्तव्य को लेकर उन पर निशाना साधा। निशाना सही निशाने पर लगा, यह इससे प्रमाणित होता है कि अब राहुल गांधी के साथ कांग्रेस के अन्य नेता स्पष्टीकरण देने के साथ यह समझाने में लगे हुए हैं कि शक्ति के इतने प्रकार होते हैं और उनके कहने का यह नहीं, वह मतलब था। इससे काम चलने वाला नहीं है, क्योंकि राजनीतिक लड़ाई में हिंदू धर्म की शक्ति का उल्लेख करने का कहीं कोई औचित्य नहीं बनता था। यदि उन्हें यह औचित्यपूर्ण लगता है तो क्या वह अन्य पंथों के रूपक का इसी तरह इस्तेमाल करते हुए अपने राजनीतिक विरोधियों पर हमला करने का साहस दिखाएंगे?
यह पहली बार नहीं है, जब राहुल गांधी ने नुरेन्द्र मोदी पर निशाना साधने के लिए अर्थ का अनर्थ करने वाला बयान देकर कांग्रेस को राजनीतिक रूप से नुकसान पहुंचाने का काम किया हो। राहुल गांधी को तो यह अच्छे से पता होगा कि जब उन्होंने चौकीदार चोर है का जुमला उछाला था, तो भाजपा ने किस तरह उसका उपयोग अपने पक्ष में कर लिया था। इसी तरह उन्हें यह भी स्मरण होना चाहिए था कि सर्जिकल स्ट्राइक के बाद उनका खून की दलाली वाला बयान किस तरह कांग्रेस पर भारी पड़ा था। राहुल गांधी ने हिंदू धर्म की शक्ति वाला बयान अपनी भारत जोड़ो न्याय यात्रा के समापन के अवसर पर दिया। ऐसा करके उन्होंने यही मौका उपलब्ध कराया कि इस यात्रा के स्थान पर उनके इस बयान की चर्चा हो। यह तो दिख रहा है कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं उनकी सरकार को लेकर दिन-प्रतिदिन और मुखर होते जा रहे हैं, लेकिन वह अपने शब्दों के चयन को लेकर गंभीर नहीं दिखते। यही कारण है कि वह ऐसा कोई विमर्श नहीं खड़ा कर पा रहे हैं.
