पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – सूर्य का नियत समय पर उगना, समस्त विश्व को प्रकाशित करना और फिर अस्त हो जाना यह इस बात का परिचय है कि उद्भव, उत्कर्ष और पराभव प्रकृति का शाश्वत सत्य है। वस्तुत: रात्रि के घने अंधकार में ही सूर्योदय के संकेत छिपे होते हैं, उसी प्रकार असफलता कुछ और नहीं, अपितु सफलता प्राप्ति की संसूचना ही है। इसलिए आत्म-निर्माण की दिशा में प्रयत्नशील रहें .! आत्म-निर्माण में सर्वप्रथम अपने स्वभाव का निर्माण है। स्वयं में उठने वाले कुविचारों की हानि भयंकरता तथा व्यर्थता पर विचार करना तथा उनके प्रतिपक्षी सद्विचारों को मन में स्थान देना, आत्म सुधार के लिए एक अच्छा मार्ग है। विचारों को विचारों से ही काटा जाता है। सद्विचारों की प्रबलता एवं प्रतिष्ठा बढ़ाने और कुविचारों का तिरस्कार एवं बहिष्कार करने से ही उनका अन्त हो सकता है। आत्म-निर्माण के लिए इस मार्ग का अवलम्बन करना आवश्यक है। शुभ-विचारों से उत्तम भाव का निर्माण होता है और मनुष्य का दृष्टिकोण बनता है। जैसा दृष्टिकोण होता है, वैसा ही आनन्द मनुष्य को प्राप्त होता है। जिस प्रकार साँसारिक कला कौशल एवं ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा के लिए व्यवहारिक मार्ग-दर्शन करने वाले शिक्षक की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार आत्म-निर्माण के लिए भी एक ऐसे मार्गदर्शक की आवश्यकता होती है, जिसे आत्म-निर्माण का व्यक्तिगत अनुभव हो। गुरु की आवश्यकता पर अध्यात्म ग्रन्थों में बहुत जोर दिया गया है, कारण कि अकेले अपने आपको अपने दोष ढूँढ़ने में बहुत कठिनाई होती है। अपने आप अपने दुर्गुण दिखाई नहीं देते और न अपनी प्रगति का ठीक प्रकार पता चल पाता है। जिस प्रकार छात्रों के ज्ञान और श्रम का अनुमान परीक्षक ही ठीक प्रकार लगा सकते हैं, इसी प्रकार साधन की आन्तरिक स्थिति का पता भी अनुभवी मार्ग-दर्शक ही लगा सकते हैं। रोगी अपने आप अपने रोग का निदान और चिकित्सा ठीक प्रकार नहीं कर पाता, उसी प्रकार अपनी प्रगति और अवनति को ठीक प्रकार समझना और आगे का मार्ग ढूँढ़ना भी हर किसी के लिए सरल नहीं होता। मानव जीवन के यापन के अनेक भेद-प्रभेद हैं। उनमें नाना प्रकार के कार्य हैं, किन्तु एक तत्व प्रत्येक में एक जैसा ही मिलता है। वह है – समय का सदुपयोग। जीवन की वास्तविक सम्पत्ति समय ही है। नियमित कार्यक्रम बनाकर अपने बहुमूल्य समय का सदुपयोग करने की कला जिसे आ गई, उसने सफलता का रहस्य समझ लिया। रात को सोते समय दिनभर के विचारों और कार्यों की भलाई-बुराई का विश्लेषण करके यह देखना कि आज दिन का कितना सदुपयोग, अपव्यय एवं दुरुपयोग हुआ। इसी प्रकार प्रातःकाल उठते समय दिनभर का कार्यक्रम बनाना तथा पिछले दिन की बात को स्मरण रखते हुए जीवन के अपव्यय एवं दुर्व्यय को बचाकर अधिकाधिक सदुपयोग की योजना बनाई जाए। नित्य डायरी रखकर भी इस प्रकार आत्म-निरीक्षण एवं आत्म-निर्माण का आयोजन करते रहा जा सकता है। जो दुर्गुण अपने में हो उन्हें दिन में कई बार ध्यान करके उनकी पुनरावृत्ति न होने देना एक उत्तम अभ्यास है। जिन सद्गुणों को और भी विकसित करना है, उनका भी दिन में कई बार स्मरण किया जाना चाहिए और उनको बढ़ाने के लिए जो भी अवसर प्राप्त होते रहें, उन्हें हाथ से न जाने देना चाहिए ..।
पूज्य “प्रभुश्री” जी ने कहा – आत्म शुद्धि की साधना, भौतिक दृष्टि से, लौकिक उन्नति और सुख-सुविधा की दृष्टि से बहुत उपयोगी है। इस पथ पर चलने वाला पथिक दिन-दिन इस संसार में अधिकाधिक आनन्ददायक परिस्थितियाँ उपलब्ध करता जाता है। उसकी प्रगति के द्वार तेजी से खुलते जाते हैं। पारलौकिक दृष्टि से तो यह आत्म शुद्धि की साधना महान पुरुषार्थ ही है। जीवन लक्ष्य की पूर्ति इसी में है। मुक्ति और स्वर्गं का एक मात्र मार्ग है – स्वाध्याय और सत्संग, चिन्तन और मनन यह चार उपाय अपनी अन्तःभूमि के निरीक्षण, परीक्षण करने, त्रुटियों एवं दोषों को समझने तथा कुविचारों को त्याग कर सत्प्रवृत्तियों अपनाने के है। यह चार उपाय भी साधना के ही अंग हैं। जीवन समस्याओं को सुलझाने में सहायक सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय करना हर विचारशील धर्मप्रेमी व्यक्ति का एक दैनिक नित्यकर्म होना चाहिए। आज किन्हीं पौराणिक कथा ग्रन्थों या आज हजारों-लाखों वर्ष पूर्व की स्थिति के अनुरूप मार्गदर्शन करने वाले संस्कृत ग्रन्थों का बार-बार पढ़ना ही स्वाध्याय माना जाता है। यह मान्यता अस्वाभाविक है। आज हमें ऐसी पुस्तकों के स्वाध्याय की आवश्यकता है, जो वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप जीवन के सर्वांगीण विकास में सहायक हो सकें। प्रत्येक युग में सामयिक ऋषि उत्पन्न होते हैं ओर वे देश, काल, पात्र के अनुरूप जनशिक्षण करते हैं। आज के युग में विनोबा, दयानन्द, विवेकानन्द, रामकृष्ण परमहंस, तुकाराम, कबीर आदि सन्तों का साहित्य जीवन निर्माण की दिशा में बहुत सहायक हो सकता है। आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण एवं आत्म-विकास का जो विवेचनात्मक सत्साहित्य मिल सके, हमें नित्य नियमित रूप से पढ़ते रहना चाहिए। स्वाध्याय की दैनिक आदत इतनी आवश्यक है कि उसकी उपेक्षा करने से आत्मिक प्रगति के मार्ग में प्रायः अवरोध ही पैदा हो जाता है।सत्संग का अर्थ है – सम्भ्रान्त, आदर्श चरित्र तत्त्वदर्शी मनीषियों की संगति सान्निध्य और शिक्षा का अवगाहन। ऐसे मनीषी आज बहुत ही कम हैं। जो हैं वे कार्य व्यस्त रहने के कारण व्यक्तिगत सत्संग के लिए समय नहीं दे पाते। ऐसी दशा में आत्म निर्माण सम्बन्धी प्रवचनों की जहाँ व्यवस्था हो वहाँ पहुँचा जा सकता है। महापुरुषों के ग्रन्थ भी सत्संग का काम दे सकते हैं। वे मनीषी भले ही हमसे दूर हों या स्वर्गवासी हो चुके हों तो भी उनके विचार उनके लिखे ग्रन्थों में सदा प्रस्तुत मिलेंगे और वे हमें सत्संग का लाभ देते रहेंगे ..।