☀ प्रभु प्रेमी संघ ? 06 मार्च, 2024 (बुधवार)
पूज्य सद्गुरुदेव आशीषवचनम्
।। श्री: कृपा ।।
मनुष्य में अंतर्निहित श्रेष्ठता का प्रकटीकरण ही शिक्षा का मूल उद्देश्य है। प्रत्येक व्यक्ति को जन्म से ही अच्छी शिक्षा और संस्कार प्राप्त कर अपने जीवन को श्रेष्ठ और सुसंस्कृत बनाने का अधिकार प्राप्त है। शिक्षित व्यक्ति न केवल अपने व्यक्तिगत जीवन में सकारात्मक परिवर्तन कर सकता है, अपितु वह समाज और राष्ट्र की उन्नति में भी उल्लेखनीय योगदान दे सकता है। विद्या को सर्वश्रेष्ठ धन कहा गया है। हमारी संस्कृति में दान की बड़ी महत्ता है तो यदि हम समर्थ होकर समाज के हित में कुछ योगदान करना चाहते हैं तो किसी अक्षम व्यक्ति को शिक्षित और सुसंस्कारी बनाएँ। विद्या दान सर्वश्रेष्ठ दान है ..! वेद में विद्या दान को सबसे श्रेष्ठ दान माना गया है। शिक्षा के लिए दिया गया दान सबसे बड़ा होता है। यह एक विद्यार्थी के माध्यम से कई पीढ़ियों तक पहुँचता है। विद्या दान कर सँवारें – गरीब बच्चों का भविष्य। विद्या दान से बढ़कर कुछ भी नहीं है, इससे आत्म संतुष्टि मिलती है। प्रत्येक व्यक्ति को जन्म से ही अच्छी शिक्षा और संस्कार प्राप्त कर अपने जीवन को श्रेष्ठ और सुसंस्कृत बनाने का अधिकार प्राप्त है। शिक्षित व्यक्ति न केवल अपने व्यक्तिगत जीवन में सकारात्मक परिवर्तन कर सकता है, अपितु वह समाज और राष्ट्र की उन्नति में भी उल्लेखनीय योगदान दे सकता है। विद्या को सर्वश्रेष्ठ धन कहा गया है। हमारी संस्कृति में दान की बड़ी महत्ता है तो यदि हम समर्थ होकर समाज के हित में कुछ योगदान करना चाहते हैं तो किसी अक्षम व्यक्ति को शिक्षित और सुसंस्कारी बनाएँ। विद्या दान इस जगत् का सर्वश्रेष्ठ दान है। विद्या एक ऐसा धन है जिसे ना तो कोई चुरा सकता है और ना ही कोई छीन सकता। यह एक मात्र ऐसा धन है जो बाँटने पर कम नहीं होता, बल्कि इसके विपरीत बढ़ता ही जाता है। हमने देखा होगा कि हमारे समाज में जो शिक्षित व्यक्ति होते हैं, उनका एक अलग ही मान-सम्मान होता है और लोग उन्हें हमारे समाज में विशेष आदर देते हैं। शिक्षा लोगों के मस्तिष्क को उच्चस्तर पर विकसित करने का कार्य करती है और समाज में लोगों के बीच सभी भेदभावों को मिटाने में सहयोग करती है। यह हमारी अच्छा अध्ययन कर्ता बनने में सहायता करती है और जीवन के हर पहलू को समझने के लिए सूझ-बूझ को विकसित करती है। यह सभी मानव अधिकारों, सामाजिक अधिकारों, देश के प्रति कर्तव्यों और दायित्वों को समझने में भी हमारी सहायता करती है। शिक्षा हममें आत्म-विश्वास विकसित करने के साथ ही हमारे व्यक्तित्व निर्माण में भी सहायता करती है। शिक्षा प्राप्त करने और शिक्षण देने दोनों ही क्षेत्रों में सत्य का स्थान सर्वोपरि है। शिक्षा राष्ट्र के आर्थिक, सामाजिक विकास का शक्तिशाली साधन है। शिक्षा राष्ट्रीय सम्पन्नता एवं राष्ट्र कल्याण की कुँजी है। यूनिवर्सिटी या रिसर्च कॉलेज में पढ़ते हुए केवल कुछ ज्ञान प्राप्त करके चले जाना शिक्षा का यथार्थ उद्देश्य नहीं है। शिक्षा तभी सार्थक है, जब शिक्षा देश की समस्याओं के समाधान के काम आए। देश में उत्तम दशा, अच्छी अवस्था व सम्पन्नता लाने का कारण बनें …।
