सत्ता के गलियारे से ..रवि अवस्थी
** न्यायप्रिय मुखिया होने का परिचय
गलती को समय रहते सुधार लेना समझदारी की पहचान है। मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव ने प्रदेश के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी कैलाश मकवाना की सीआर को सुधार कर एक सुलझे हुए राजनेता व न्यायप्रिय मुखिया होने का परिचय दिया है। मकवाना की गिनती राज्य के कर्तव्यनिष्ठ व ईमानदार अफसरों में होती है। अपने समूचे सेवाकाल में बेदाग रहे मकवाना की सीआर बिगड़वाने में रची गई साजिश को डॉ यादव ने न केवल समझा बल्कि उनकी योग्यता के मुताबिक इसमें जरूरी सुधार कर सरकार को भी तोहमत लगने से बचा लिया। कर्तव्यनिष्ठ अधिकारियों को उनका हक व सम्मान देने का एक और मामला बीते माह 10 जनवरी को भी सामने आया था। जब वर्ष 1992 बैच की महिला आइएएस श्रीमती कल्पना श्रीवास्तव को उनकी सेवानिवृत्ति के चंद दिन पहले पदोन्नति देकर एसीएस बनाया गया। खास बात यह कि प्रदेश में यह पद रिक्त नहीं होने पर सरकार ने महज दो माह के लिए नया पद सृजित किया और कैबिनेट से इसे मंजूरी भी दी गई। ऐसे उदाहरण,बिरले ही होते हैं।
** चुनौतीपूर्ण नया टॉस्क
अपने आदर्श का अनुसरण करना अच्छी बात है। इसके चलते बीजेपी के कई नेताओं ने मोदी जैकेट को
अपना लिया। दिन के लिहाज से जैकेट के रंग भी तय हो गए। मप्र तो इस मामले में एक कदम आगे ही रहा। दिल्ली और गुजरात की तर्ज पर यहां मंत्रालय की नई एनेक्सी भी बन गई और स्टेच्यू ऑफ यूनिटी से बड़ी ओंकार पर्वत पर स्टैच्यू ऑफ वननेस लोकार्पण की प्रतीक्षा में है। बनारस में एक लोक संवरा तो यहां लोकों की श्रृंखला तय हो गई। बहरहाल,नया टॉस्क स्कूबा डाइविंग कर समुद्रतल तक पहुंचने का है।मप्र में समुद्र न सही,बांध काफी हैं। देखना है,कैसे होता इस टॉस्क का अनुसरण।
** बीजेपी का नया शुभंकर
पीएम मोदी के बहुचर्चित मासिक कार्यक्रम मन की बात के अब तक 110 एपिसोड हो चुके हैं। इसका अंतिम प्रसारण 18 फरवरी को हुआ।अंतिम इसलिए कि स्वयं पीएम ने लोकसभा चुनाव के मद्देनजर इसका प्रसारण तीन माह रोके जाने की बात कही। वर्ष 2019 के चुनाव से पहले भी कार्यक्रम को कुछ माह के लिए रोका गया था। पीएम मोदी अपने तीसरे टर्म की वापसी को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हैं। विपक्षी दलों के कुछ नेता भी इससे इत्तफाक रखते हैं।बहरहाल,नए एपिसोड के नंबर 111 यानी ‘तीन इक्के’ को बीजेपी शुभंकर मानकर चल रही है। देश का सियासी माहौल और मतदाताओं का मूड भी बहुत हद तक उसके इस शुभ को लाभ में बदलने वाला बना हुआ है।
** मंदिर मुद्दा बड़ा या 370
आगामी लोकसभा चुनाव के लिहाज से बीजेपी की सियासत में मंदिर का मुद्दा बड़ा या कश्मीर से हटी धारा 370 का।इस बात को लेकर पार्टी के नेता व कार्यकर्ता भी पसोपेश में हैं। बहरहाल,फर्श से अर्श पर पहुंचाने वाला मंदिर मुद्दा अब सियासत की प्राथमिकता नहीं। यही वजह है कि साल के शुरुआत में मंदिर मामले के प्रचार—प्रसार पर जो जोश व जोर रहा।वह वक्त के साथ फीका पड़ गया है।अब सारा जोर एनडीए सरकार की 10 साल की उपलब्धियों विशेषकर 370 की जादुई संख्या पर है।इसकी बड़ी वजह,देश के वह हिस्से भी हैं जहां पहला मुद्दा मतदाताओं पर खास असर नहीं दिखाता। फिलहाल,तो मप्र सरकार आज अयोध्या यात्रा पर है।
** नाथ का डैमेज कंट्रोल
पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ अपनी पार्टी में मैनेजमेंट गुरू माने जाते हैं। यह अलग बात कि इस बार वह अपने ही मामले में मात खा गए। बहरहाल,सियासत बहुरंगी होती है। नाथ की सियासत का नया रंग हाल ही में छिंदवाड़ा में देखने को मिला। जब उन्होंने भावुक अंदाज में क्षेत्र के मतदाताओं से कहा कि आप लोग मुझे हटाना चाहते हैं तो हटा दें। मैं खुद को आप पर थोपूंगा नहीं। इस बयान के साथ ही उन्होंने अब तक हुए घटनाक्रम का सारा ठीकरा बीजेपी और मीडिया पर फोड़ा और अंत में बेटे को जिताने की अपील भी कर डाली। नाथ छिंदवाड़ा से नौ बार के सांसद व दो बार के विधायक हैं। बेटा दूसरी बार सांसद बनने के लिए प्रयासरत हैं लेकिन नाथ छिंदवाड़ा में पहली बार इतने चिंतित व भावुक नजर आए।
**नहीं थमी गुटबाजी
गुटबाजी मप्र कांग्रेस की एक बड़ी कमजोरी रही है। जिसे दूर करने के जतन कई बार हुए लेकिन नतीजा सिफर रहा। मप्र में जारी भारत जोड़ो न्याय यात्रा में भी इसकी झलक दिखी। मसलन,पार्टी प्रदेशाध्यक्ष जीतू पटवारी ने मीडिया को यात्रा का ब्योरा दिया तो पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के गढ़ राघौगढ़ का जिक्र करना ही भूल गए।तब दिग्विजय सिंह को ही कहना पड़ा कि गुना के बाद राघौगढ़ भी एक छोटा सा कस्बा है। जहां यात्रा के स्वागत का कार्यक्रम तय है। ग्वालियर यात्रा में राहुल के भाषण में पार्टी के दिग्गज नेताकमलनाथ,दिग्विजय के नाम सबसे आखिर में रहे जबकि नए नेतृत्व का नाम पहले नंबर पर। तीसरी बानगी,कमलनाथ अपने बेटे के साथ ग्वालियर तो पहुंचे,लेकिन नकुलनाथ न यात्रा में दिखे न सभा में। यात्रा के तीसरे दिन कमलनाथ ने यात्रा से दूरी बनाकर रखी और वह दिल्ली में मौजूद रहे।
** रपटीली राह पर फिसले डोडियार
कहते हैं,राजनीति की राह बेहद रपटीली होती है। जो संभल कर चला। वह आगे बढ़ा। वर्ना तो डगमगाते देर नहीं लगती। पूर्व प्रधानमंत्री स्व.अटल बिहारी वाजपेयी ने तो इस विषय पर एक किताब ही लिखी है। नई बानगी,सैलाना सीट के निर्दलीय विधायक कमलेश्वर डोडियार हैं। जीतने के बाद पहली बार विधानसभा आए तो उनकी गरीबी व संघर्ष के किस्से मीडिया की सुर्खी बन गए,लेकिन ‘प्रभुता’का मद,उनमें कुछ ज्यादा ही जल्दी छलक बैठा। विधायक के खिलाफ पुलिस ने एक दुकानदार की शिकायत पर करोड़ रुपए की अड़ीबाजी का मामला दर्ज किया है। बचाव में डोडियार के अपने तर्क हो सकते हैं,लेकिन फिसल तो बैठे ही। इस मामले में एक प्रमुख राजनीतिक दल के मीडिया प्रभारी के विचार काबिलगौर हैं कि व्यक्ति की असल पहचान उसे मिली’प्रभुता’के समय ही होती है।
** बेरोजगारी की काट
मप्र में बढ़ती बेरोजगारी को लेकर विपक्षी दल जब—तब सत्तारूढ़ बीजेपी की घेराबंदी करते रहे हैं,लेकिन केंद्र के श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने इस मामले में सूबे के बीजेपी नेताओं की राह आसान कर दी है। मंत्रालय की हालिया रिपोर्ट में बताया गया कि ग्रामीण क्षेत्रों में देश में सबसे कम बेरोजगारी दर 0.8 % मप्र में है। शहरी क्षेत्रों की बेरोजगारी मामले में भले ही हम टॉप टेन राज्यों की सूची में शीर्ष पर हैं,लेकिन सियासतदारों का ज्यादा फोकस तो गांव पर ही होता है। ऐसे में चुनावी सभाओं में तो यह आंकड़ें काम आने ही वाले हैं। यह अलग बात है कि रोजगार की तलाश में ग्रामीण क्षेत्रों से होने वाले पलायन का जिक्र इस रिपोर्ट में नहीं है।
** कैसे जन्मे कौरव !
महाभारत काल में हस्तिनापुर के महाराज धृतराष्ट्र सौ पुत्रों के पिता कैसे बने,पौराणिक कथाओं में इसका अलग— अलग वर्णन है। एक कथा में बताया गया कि ऋषि वेदव्यास के वरदान से ही गांधारी को सौ पुत्रों के साथ ही एक पुत्री दुशाला की मां बनने का गौरव मिला। इन सभी का जन्म एक घड़े से हुआ लेकिन प्रदेश में उच्च शिक्षा विभाग प्रमुख केसी गुप्ता ने हाल ही में यह कहकर चौंका दिया कि महाभारत काल में सौ कौरव स्टेम सेल पद्धति से जन्मे थे। मौका था,भोपाल में राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लेकर आयोजित कार्यशाला का। स्टेम सेल नवजात शिशु की गर्भनाल से मिलने वाला एक तरह का द्रव है। इसकी मदद से अनेक जटिल रोगों के उपचार के दावे सामने आते रहे हैं।भारत में यह पद्धति अब तक अनुसंधान की स्टेज पर है। कनाडा के एक दावे को छोड़कर इसकी मदद से नई संतान की उत्पत्ति की नजीर अब तक कहीं सामने नहीं आई। ऐसे में मैनिट भोपाल से एम.टेक. गुप्ता के कथन पर शिक्षाविदों का चौंकना स्वाभाविक था।
** सहरियों में मधुमेह!
किसी दौर में मधुमेह व ब्लड प्रेशर को अमीरों की बीमारी कहा जाता था,लेकिन बदलते भारत में अब बीमारियां भी अपनी श्रेणियां बदल रहीं है। हाल ही में एक चौंकाने वाली खबर विदिशा से आई। जिले के करीब पौने पांच सौ गांव में आदिवासियों की विशेष संरक्षित जनजाति सहरिया व भारिया निवास करती है। ऐसे ही करीब 50 गांव में हुए स्वास्थ्य परीक्षण के दौरान डायबिटीज व बीपी के दो सौ मरीज मिले। जबकि टीबी व सिकल सेल के सिर्फ दो। सरकार इन जनजातियों की महिलाओं को हजार रुपए मासिक पोषण आहार अनुदान देने के साथ ही इनके लिए सिकल सेल उन्मूलन अभियान भी चला रही है।सिकल सेल पीड़ितों की संख्या कम मिलना शुभ संकेत है,लेकिन एक दौर में विलुप्त होने की कगार पर पहुंची इस विशेष जनजाति में बीपी व डायबिटीज के बढ़ते प्रभाव को क्या माना जाए?
