हंस में छपने की सबकी अपनी- अपनी कथा- व्यथा है

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जनवरी की कड़कती सर्दी में दोपहर का वक्त था। मेरे लंच का समय हो चुका था। टेबल पर थाली लग चुकी थी। एक ही कौर मुख में डाला था कि फ़ोन बज उठा। देखा तो पंकज सुबीर जी का नाम चमक रहा था। मैं एकदम ख़ुशी से सकपका गई, क्योंकि मैं पढ़ती सबको हूँ बिना किसी राय, राग- द्वेष के लेकिन संवाद व संबंध स्थापित करने में बेहद- बेहद कमजोर हूँ। लाइजनिंग की शैली से सात समुंदर दूर हूँ। किताब पढ़ती हूँ, लेखक को पढ़ने की ज़िद कभी नहीं रखती हूँ। पद के स्थान पर प्रतिभा-पाठ पसंद है।

 

औपचारिक शिष्टाचार के पश्चात मुद्दे पर आ गए। हमने स्त्री लेखन से संबंधित कई पक्ष रखे। पंकज जी ने कहा कि- ये वाला मुझे दे दीजिए। मैंने हामी भरी और संवाद समाप्त हुआ। 11 जनवरी 2024 को दोपहर तीन बजे मैसेज प्राप्त हुआ कि लेख इस तारीख़ तक दें। हामी के वक्त ख़ास व्यस्त नहीं थी लेकिन उसके बाद एक पल को साँस लेने की फ़ुरसत नहीं मिल रही थी बावजूद रोज़ कुछ न कुछ लिखती। रोज़ किसी न किसी का नाम याद करती, फिर एक पैरा लिखकर सिरहाने लटकते नोटिस बोर्ड पर लटका देती॰॰॰

 

श्रमपूर्ण संपादकीय कार्य बड़ी कुशलतापूर्वक पूर्ण करने की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ! मुझसे लिखवा लेने के लिए हार्दिक आभार ?

 

अब #हंसकथा भी सुनाते चलें। मेरा हंस से उतना ही पुराना संबंध है जितना पुराना हंस का द्वितीय संस्करण स्थापना है। मेरे ह्रदय पर कभी भी किसी पत्रिका में छपने की टैग लाइन या ताने जैसा प्रभाव नहीं रहा है। आज भी छपने- छपाने की भूख ना के बराबर है। पढ़ने की बीमारी जारी है॰॰॰ लगभग डेढ़ दशक पहले राजेंद्र जी के निमित्त वीना जी का फ़ोन आया था कि- सर आपसे बात करना चाहते हैं॰॰॰

 

मेरे हाथ- पैर हिलने लगे कि जाने अब क्या ही बिजली गिरेगी ? शोध के लिए प्रश्न पूछना कहीं घातक न हो॰॰॰ मेरे मन के फ़ितूर के पीछे खलिहर लोगों की बातें थीं। इसीलिए अब सीधा फ़ंडा है मेरा “पीठ पर आँख और कान में ज़ुबान” रखने वालों से सौ गज़ दूरी है ज़रूरी॰॰॰ ख़ैर,

 

अपना लिखा पत्रिका के लिए भेजो” मैं सन्न होकर भी तपाक से बोल पड़ी। “हंस जैसी उत्कृष्ट पत्रिका में छपने जितनी योग्यता मुझमें नहीं है।” कहकर मैंने फ़ोन काट दिया।

 

दिल्ली आने के बाद भी कभी प्रयास नहीं किया बावजूद गत साल एक मूर्खता की थी। उस कहानी की कहानी फिर कभी लिखूँगी॰॰॰ बहरहाल राजेंद्र जी होते तो शायद रचना निखर जाती या फिर नए आकार के साथ संवर जाती॰॰॰ लंबे वर्षों तक संगम पाडेय जी की भी भूमिका अहम रही है। संजय सहाय से अधिक मैंने दुर्वा सहाय की रचना को पढ़ा है।

 

वो वाली वीना जी की आवाज़ की ध्वनि आज तक कानों में मिश्री की तरह मौजूद है। जब दो दिन पहले उनका फ़ोन आया। आवाज़ की तासीर इतनी सघन थी कि सीधे मुख से निकला कैसी हैं आप!, आप वीना जी बोल रही हैं न॰॰॰ उनकी आवाज़ खनक उठी। आमने- सामने भेंट गत साल ही हो पाई। विस्तार से फिर कभी॰॰॰

 

जिन दिनों पीएचडी कर रही थी, उन दिनों मेरी तबियत काफ़ी ख़राब थी लेकिन ज्वाइनिंग लेटर मेरे हाथ में था। मुझे क़ानूनी तय नियम के तहत शोध जमा करने की सनक सवार थी। बिस्तर पर लेटे- लेटे ही कार्य को गति देने में जी जान से जूट गई। अग़ल- बग़ल पुस्तकों का मजमा जमाया ताकि किसी को बार-बार आवाज़ देकर परेशान न करना पड़े।

 

अपने को सदैव स्कॉलरशिप की माया से मुक्त रखने की आदत रही है। मेरे शोध में एक बेहद महत्वपूर्ण अध्याय था। जिसके लिए उत्कृष्ट संपादकों व पत्रकारों की राय मेरे लिए अहम थी। मैंने यह चर्चा अपने एक परिचित से की जिनकी वजह से मेरे दुर्लभ स्थान पर थोड़ी बहुत किताबें पढ़ने के लिए उन दिनों उपलब्ध हो ज़ाया करती थीं।

 

उन्होंने मुझे तीन नाम व नंबर दिए- राजेंद्र यादव- हंस, कालीचरण- मड़ई, शशि शेखर- दैनिक हिंदुस्तान। उनके सुझाव पर दस दिन तक अमल करती रही।

 

“ये सभी दिग्गज हैं, एक शोधार्थी से भला क्यों संवाद करेंगे? लेकिन अवधेश जी ने कहा कि “बात करो। कई बार बहुत बड़े नाम वाले अधिक सहज होते हैं। छोटे अधिक ग़रूर में होते हैं।” उनका कथन सौ प्रतिशत सत्य निकला।

 

राजेंद्र जी के क़िस्से इतने मशहूर थे कि अंदर से अजीब कोफ़्त व भय उपजता था। एक दिन हिम्मत करके फ़ोन कर लिया। वीना उनियाल जी ने फ़ोन उठाया। उनकी सुमधुर आवाज़ से दिल खिल गया। तब से लेकर आज तक वीना जी ह्रदय में हैं।

 

राजेंद्र जी ने फ़ोन पकड़ा और कहा कि- कल ऑफिस आ जाना।” मैंने भी बिना किसी लाग- लपेट के कहा- “मैं नहीं आ सकती। दिल्ली मेरे लिए इस वक्त बहुत-बहुत दूर है। आपको फ़ोन पर ही उत्तर देना होगा।”

 

वह एक क्षण के लिए मौन हो गए। संभवतः एक कम वय लड़की से ऐसे उत्तर की उन्हें आशा नहीं थी। फिर भी उन्होंने कुछ देर सोचने के पश्चात हारिश भाई को आवाज़ देते हुए कहा कि- कल इसी वक्त फ़ोन कर लेना। मैंने अपने बेड के दाएँ लटकते कैलेंडर पर समय नोट किया। हारिश भाई से भी मेरा परिचय आवाज़ के माध्यम से पहले हुआ। भेंट बाद में हुई। हारिश भाई तब से बेहद प्रिय हैं। आत्मीय संवाद बना हुआ है। फोनिक नहीं बस सलाना जलसा पुस्तक मेला॰॰॰

 

अगले दिन की दास्ताँ फिर कभी तवील से लिखूँगी।

 

साल में केवल तीन आलेख लिखती हूँ। दो लिख चुकी थी।

€ कॉरपोरेट कंट्री में किसान

€ : कविता का उन्वान

€ : आलोचना की राजनीति और स्त्री रचनात्मकता

मेरा इस साल का कोटा पूरा हो चुका है। साल में पहले एक लिखती। फिर दो, अब तीन। मेरे आत्मीय अग्रज ने समझाकर कहा है कि “धीमी गति को थोड़ा और गति दे दो। ताकि पढ़ा समेट सको” इसलिए इस वर्ष गति को थोड़ी प्रगति देना तय है। कोई अपरिहार्य या विकट संकट आया तो ही टाला जा सकता है वरना परदा उठने की प्रतीक्षा करें॰॰॰

 

साहित्यिक कला की जादूगरनी मेरी बेहद प्रिय पारूल के हाथ में जादू है। उन्होंने ही इस अंक का कवर तैयार किया है। उनके चित्रों के किरदारों की बोलती आँखें और भाव- भंगिमा की दीवानी हूँ मैं! मेरे कहानी संग्रह #सियोलसेसरयू के लिए अनुरोध किया था लेकिन उन दिनों पारूल व्यस्त थीं। उनकी व्यस्तता का परिणाम यह रहा कि स्वयं ही चित्र बनाने की मुसीबत झेलनी पड़ी। वैसे झेलना बुरा नहीं रहा है बावजूद कसक है कि काश पारूल की बोलती आँखों वाली लड़की किताब पर होती॰॰॰ आपकी कला-दृष्टि के कलात्मक-संवेदनात्मक अनुभूति को प्रेम ?। अलग से फिर कभी॰॰॰

 

नोट : धीमीगति का रेडियो हूँ। हंस परिवार को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ!

आभार ?

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