
पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – भारतीय संस्कृति की आधार सत्ता है – ऋषि परम्परा ! ऋषियों से ही ज्ञान-विज्ञान, कला-संस्कृति और साहित्य उपलब्ध हुआ है ! अतः जीवन सिद्धि हेतु वेद विहित, शास्त्र सम्मत व आचार्य द्वारा उपदेशित मार्ग का अनुसरण करें ..! भारतीय संस्कृति का एक आधार दानशीलता है। “दानशूरो विशिष्यते …” “दानवीर पुरुष ही अन्य सब पुरुषों से विशिष्ट है”। दान आत्मा का दिव्य गुण है। दानशीलता की सात्त्विक भावना जिस पुरुष के अन्तःकरण में प्रवेश करती है, उसे उदार बना देती है। उसे प्रकाश का पुँज बना देती है। दान रुपये पैसे या अन्न, अक्षर, औषधि के साथ श्रम का भी हो सकता है। सच्चा दानी लोक-उपकार को प्रमुखता देता है। वह दधीचि की तरह अपनी हड्डियाँ लोक-उपकार के लिए दान दे देता है। व्यास जी की तरह अपनी आयु सद्ग्रन्थों की रचना में लगा देता है? द्रोणाचार्य की तरह शास्त्र-विद्या का प्रचार करता है। महर्षि पाणिनी की तरह व्याकरण बनाता है, महात्मा बुद्ध की तरह प्रेम धर्म का उपदेश देता है। इसी प्रकार सच्चा दानी समय और देश की आवश्यकताओं के अनुसार अपनी बुद्धि, योग्यता, कला, प्रतिभा और शक्तियों का दान करता है। भारतीय संस्कृति परमार्थ और परोपकार को प्रचुर महत्त्व देती है। जब अपनी सात्त्विक आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाये, तो लोक-कल्याण के लिए दूसरों की उन्नति में हाथ बटाना चाहिए। प्राचीन काल में ऐसे निस्वार्थी लोक-हित-निरत ऋषि, मुनि, ब्राह्मण, पुरोहित, योगी, संन्यासी होते थे, जो समस्त आयु लोक-हित के लिए दे डालते थे। कुछ विद्यादान, पठन-पाठन में ही आयु व्यतीत करते थे। उपदेश द्वारा जनता की शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग, सहयोग, सुख, सुविधा, विवेक, धर्मपरायणता आदि सद्गुणों को बढ़ाने का प्रयत्न किया करते थे। मानवीय स्वभाव में जो सत तत्व हैं, उसी की वृद्धि में वे अपने अधिकाँश दिन व्यतीत करते थे। ये ज्ञानी उदार महात्मा अपने आप में जीवित-कल्याण की संस्थाएँ थे, यज्ञ रूप थे। जब ये जनता की इतनी सेवा करते थे, तो जनता भी अपना कर्त्तव्य समझ कर इनके भोजन, निवास, वस्त्र, सन्तान का पालन-पोषण का प्रबन्ध करती थी। जैसे लोक हितकारी संस्थाएँ आज भी सार्वजनिक सहयोग राशि से चलाई जाती हैं, उसी प्रकार ये ऋषि, मुनि, ब्राह्मण भी दान-पुण्य आदि द्वारा निर्वाह करते थे और उस सेवा का अधिकांश भाग पारमार्थिक कार्यों में लगा देते थे। प्राचीन भारतीय ऋषि-मुनियों का व्यक्तित्व इतना उच्च, पवित्र और प्रवृत्ति इतनी सात्त्विक होती थी कि उनके सम्बन्ध में किसी प्रकार के सन्देह की कल्पना तक नहीं की जा सकती थी, क्योंकि उन्हें सेवा देकर जनता उसके सदुपयोग के विषय में निश्चित रहती थी। इस प्रकार हमारे पुरोहित, विद्यादान देने वाले ब्राह्मण, ऋषि-मुनि दान दक्षिणा द्वारा जनता की सर्वतोमुखी उन्नति का प्रबन्ध किया करते थे …।