☀ प्रभु प्रेमी संघ ? 29 फरवरी, 2024 (गुरुवार)

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पूज्य सद्गुरुदेव आशीषवचनम्
।। श्री: कृपा ।।
? पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – भारतीय संस्कृति की आधार सत्ता है – ऋषि परम्परा ! ऋषियों से ही ज्ञान-विज्ञान, कला-संस्कृति और साहित्य उपलब्ध हुआ है ! अतः जीवन सिद्धि हेतु वेद विहित, शास्त्र सम्मत व आचार्य द्वारा उपदेशित मार्ग का अनुसरण करें ..! भारतीय संस्कृति का एक आधार दानशीलता है। “दानशूरो विशिष्यते …” “दानवीर पुरुष ही अन्य सब पुरुषों से विशिष्ट है”। दान आत्मा का दिव्य गुण है। दानशीलता की सात्त्विक भावना जिस पुरुष के अन्तःकरण में प्रवेश करती है, उसे उदार बना देती है। उसे प्रकाश का पुँज बना देती है। दान रुपये पैसे या अन्न, अक्षर, औषधि के साथ श्रम का भी हो सकता है। सच्चा दानी लोक-उपकार को प्रमुखता देता है। वह दधीचि की तरह अपनी हड्डियाँ लोक-उपकार के लिए दान दे देता है। व्यास जी की तरह अपनी आयु सद्ग्रन्थों की रचना में लगा देता है? द्रोणाचार्य की तरह शास्त्र-विद्या का प्रचार करता है। महर्षि पाणिनी की तरह व्याकरण बनाता है, महात्मा बुद्ध की तरह प्रेम धर्म का उपदेश देता है। इसी प्रकार सच्चा दानी समय और देश की आवश्यकताओं के अनुसार अपनी बुद्धि, योग्यता, कला, प्रतिभा और शक्तियों का दान करता है। भारतीय संस्कृति परमार्थ और परोपकार को प्रचुर महत्त्व देती है। जब अपनी सात्त्विक आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाये, तो लोक-कल्याण के लिए दूसरों की उन्नति में हाथ बटाना चाहिए। प्राचीन काल में ऐसे निस्वार्थी लोक-हित-निरत ऋषि, मुनि, ब्राह्मण, पुरोहित, योगी, संन्यासी होते थे, जो समस्त आयु लोक-हित के लिए दे डालते थे। कुछ विद्यादान, पठन-पाठन में ही आयु व्यतीत करते थे। उपदेश द्वारा जनता की शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग, सहयोग, सुख, सुविधा, विवेक, धर्मपरायणता आदि सद्गुणों को बढ़ाने का प्रयत्न किया करते थे। मानवीय स्वभाव में जो सत तत्व हैं, उसी की वृद्धि में वे अपने अधिकाँश दिन व्यतीत करते थे। ये ज्ञानी उदार महात्मा अपने आप में जीवित-कल्याण की संस्थाएँ थे, यज्ञ रूप थे। जब ये जनता की इतनी सेवा करते थे, तो जनता भी अपना कर्त्तव्य समझ कर इनके भोजन, निवास, वस्त्र, सन्तान का पालन-पोषण का प्रबन्ध करती थी। जैसे लोक हितकारी संस्थाएँ आज भी सार्वजनिक सहयोग राशि से चलाई जाती हैं, उसी प्रकार ये ऋषि, मुनि, ब्राह्मण भी दान-पुण्य आदि द्वारा निर्वाह करते थे और उस सेवा का अधिकांश भाग पारमार्थिक कार्यों में लगा देते थे। प्राचीन भारतीय ऋषि-मुनियों का व्यक्तित्व इतना उच्च, पवित्र और प्रवृत्ति इतनी सात्त्विक होती थी कि उनके सम्बन्ध में किसी प्रकार के सन्देह की कल्पना तक नहीं की जा सकती थी, क्योंकि उन्हें सेवा देकर जनता उसके सदुपयोग के विषय में निश्चित रहती थी। इस प्रकार हमारे पुरोहित, विद्यादान देने वाले ब्राह्मण, ऋषि-मुनि दान दक्षिणा द्वारा जनता की सर्वतोमुखी उन्नति का प्रबन्ध किया करते थे …।
? पूज्य “प्रभुश्री” जी ने कहा – भारतीय दान परम्परा और कुछ नहीं, उधार देने की एक वैज्ञानिक पद्धति है। जो कुछ हम दूसरों को देते हैं, वह हमारी रक्षित पूँजी की तरह जमा हो जाता है। अच्छा दान वह है जो जरूरतमंदों को दिया जाता है, बिना जरूरतमंदों को देना कुछ विशेष महत्व नहीं रखता। कुपात्रों को धन देना व्यर्थ है। जिसका पेट भरा हुआ हो, उसे और भोजन कराया जाये, तो वह बीमार पड़ेगा और अपने साथ दाता को भी अधोगति के लिए घसीटेगा। भारतीय संस्कृति के अनुसार दान देना बहुत ही उत्तम धर्म कार्य है। जो अपनी रोटी दूसरों को बाँट कर खाता है, उसको किसी बात की कमी नहीं रहती। जो अपने पैसे को जोड़-जोड़कर जमीन में गाढ़ते हैं, उन पाषाण हृदयों को क्या मालूम होगा कि दान देने में कितना आत्म-संतोष, कितनी मानसिक तृप्ति मिलती है। आत्मा प्रफुल्ल हो जाती है। मृत्यु बड़ी बुरी लगती है, पर मृत्यु से बुरी बात यह है कि कोई व्यक्ति दूसरे को दुःखी देखे, और उसकी किसी प्रकार भी सहायता करने में अपने आपको असमर्थ पावे। हिन्दू शास्त्र एक स्वर से कहते हैं कि मनुष्य जीवन में परोपकार ही सार है। हमें जितना भी सम्भव हो सदैव परोपकार में रत रहना चाहिए। किन्तु यह दान अभिमान, दम्भ, कीर्ति के लिए नहीं, अपितु आत्म-कल्याण के लिए होना चाहिए। मेरे कारण दूसरों का भला हुआ है, यह सोचना उचित नहीं हैं। दान देने से स्वयं हमारी ही भलाई होती है। हमें संयम का पाठ मिलता है। यदि आप दान न भी दें, तब भी संसार का काम तो चलता ही रहेगा। परमात्मा इतना विपुल भंडार लुटा रहे हैं कि हमारी छोटी-सी सहायता के बिना भी जनता का कार्य चल ही जायेगा। आप यदि न देंगे, तो कोई भूखा नहीं मर जायेगा। किसी प्रकार उसके भोजन का प्रबन्ध हो ही जायेगा। लेकिन आपके हाथ से दूसरों के उपकार को करने का एक अवसर जाता रहेगा। हमारी उपकार भावना कुँठित हो जायेगी। दान से जो मानसिक उन्नति होती, आत्मा को जो शक्ति प्राप्त होती, वह दान लेने वाले को नहीं, वरन् देने वाले को प्राप्त होती है। दूसरों का उपकार करना मानो एक प्रकार से अपना ही कल्याण करना है। किसी को थोड़ा-सा पैसा देकर भला हम उसका कितना भला कर सकते हैं? किन्तु, उसकी अपेक्षा हम अपना भला हजार गुना कर लेते हैं। इस प्रकार हमारी उदारता का विकास हो जाता है और आनन्द-स्त्रोत खुल जाता है …।

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