भोपाल के युवाओं में ‘ब्लड किक’ का खतरनाक ट्रेंड

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भोपाल के गांधी मेडिकल कॉलेज में 2026 में जनवरी से अब तक 5 ऐसे युवक इलाज के लिए पहुंचे हैं, जिन्हें ब्लड कंपोनेंट्स की लत है। अस्पताल पहुंचने का पैटर्न लगभग एक जैसा रहा। माता-पिता को पता चलते ही उन्होंने उनका घर से बाहर निकलना बंद कर दिया।

3 दिन से एक सप्ताह तक समझाने की कोशिश की गई, लेकिन युवक आक्रामक होकर झगड़ने लगे। इसके बाद माता-पिता उन्हें काउंसलिंग के लिए मनोरोग विभाग में मनोचिकित्सक के पास ले गए।

सभी 5 मामलों में युवाओं की उम्र 18 से 25 वर्ष है। इनकी केस स्टडी की गई है। इसमें जिज्ञासा, गलत धारणाएं और अवैध नेटवर्क कारण पाए गए हैं। यह स्टडी अभी पूरी नहीं हुई है।

खून का इस्तेमाल नशे की तरह कर रहे

मनोरोग विभाग के प्रमुख डॉ. जेपी अग्रवाल के अनुसार खून को नशे की तरह इस्तेमाल के मामले सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं। यह युवाओं की बिना सोचे-समझे कुछ नया करने की प्रवृत्ति का परिणाम है। वे सही और गलत में अंतर करना भूल जाते हैं।

डॉ. अग्रवाल कहते हैं कि यह पारंपरिक नशा नहीं, बल्कि खतरनाक प्रयोग है। कुछ युवा ब्लड प्लाज्मा या अन्य कंपोनेंट्स इंजेक्ट कर ‘अलग तरह का असर’ महसूस करने की कोशिश करते हैं। मेडिकल साइंस में ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि खून से नशा होता है। यह मिथक और जोखिम भरा व्यवहार है।

भारत के लिए नया, विदेश में ऐसे कई केस

डॉ. अग्रवाल के अनुसार खून या उसके कंपोनेंट्स का नशे के रूप में इस्तेमाल सामान्य या सुरक्षित नहीं है। यह खतरनाक और गलत प्रवृत्ति है। खेलों में “ब्लड डोपिंग” प्रदर्शन बढ़ाने के लिए इस्तेमाल होता रहा है।

अब यह प्रवृत्ति आम लोगों में भी देखी जा रही है। खून के नशे में सिंथेटिक ऑक्सीजन कैरियर्स, ब्लड ट्रांसफ्यूजन और एरिथ्रोपोइटिन (EPO) तीन सामान्य तरीके हैं। इन पर वर्ल्ड एंटी डोपिंग एजेंसी (वाडा) ने प्रतिबंध लगाया है।

अब जानिए, भोपाल के वे 5 मामले

  • केस-1: कोलार निवासी 20 वर्षीय कॉलेज छात्र ने सोशल मीडिया ट्रेंड देखकर ब्लड प्लाज्मा इंजेक्ट करने की कोशिश की। शुरुआत जिज्ञासा से हुई। लेकिन दोस्तों के सामने बार-बार करने पर उन्होंने माता-पिता से शिकायत की। समझाने पर वह नहीं माना और आक्रामक हो गया। इसके बाद परिजन उसे जबरन काउंसलिंग के लिए अस्पताल ले गए।
  • केस-2: 21 वर्षीय युवक को साथियों ने बताया कि ब्लड कंपोनेंट्स से ‘एनर्जी किक’ मिलती है। कुछ बार प्रयोग के बाद वह इसे नियमित करने लगा। घरवालों को शक तब हुआ, जब उसने खुद को कमरे में बंद करना शुरू किया और व्यवहार बदलने लगा। एक दिन तलाशी में ब्लड बैग्स मिले। इसके बाद उसने अपने नशे के बारे में बताया।
  • केस-3: दानिश कुंज निवासी 18 वर्षीय युवक परिवार में सबसे छोटा है और बातें कम साझा करता था। वह एंग्जायटी से जूझ रहा था। इंटरनेट की भ्रामक जानकारी से प्रभावित होकर उसने सोचा कि ब्लड इंजेक्शन से मानसिक राहत मिलेगी। धीरे-धीरे यह उसकी आदत बन गया। परिवार को पता तब चला, जब उसकी तबीयत बिगड़ी और तेज बुखार आया। समझाने पर वह नहीं माना, इसलिए परिजन उसे अस्पताल ले गए।
  • केस-4: संतनगर निवासी 23 वर्षीय लैब टेक्नीशियन अवैध नेटवर्क के संपर्क में आया, जहां से उसे ब्लड कंपोनेंट्स के नशे की जानकारी मिली। शुरुआत में ‘थ्रिल’ के लिए किया गया प्रयोग धीरे-धीरे लत बन गया। घरवालों को शक तब हुआ, जब वह सैलरी के बावजूद बार-बार पैसों की मांग करने लगा और छुट्टियों में बाहर जाने लगा। झगड़े बढ़ने और व्यवहार बिगड़ने पर परिजन उसे जबरन मनोचिकित्सक के पास ले गए। काउंसलिंग में उसने इस नशे के बारे में बताया, लेकिन वह फॉलोअप के लिए दोबारा नहीं आया।
  • केस-5: 17 वर्षीय छात्र अन्य नशे के विकल्प न मिलने पर ‘इंजेक्टेबल चीजों’ की ओर आकर्षित हुआ। पहले वह चिट्टे का आदी था, लेकिन इसमें वह घरवालों की नजर में आ जाता था। ऐसे में उसे लगा कि ब्लड से भी वैसा असर मिलेगा। कुछ बार प्रयोग के बाद उसकी तबीयत बिगड़ी और उल्टी व कमजोरी होने लगी। परिवार को सच्चाई पता चलने पर पहले समझाने की कोशिश की गई। लेकिन वह नहीं माना और चिड़चिड़ा हो गया। तब उसे निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया। वहां उसकी लत की जानकारी नहीं दी गई। बाद में परिवार उसे जीएमसी के मनोरोग विभाग ले गया।

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