सुपर CM’ के सपनों से ‘सुपर साइलेंट’ तक… नरोत्तम-राठौड़ की चुप्पी में छिपी क्या कहानी

‘सुपर CM’ के सपनों से ‘सुपर साइलेंट’ तक… नरोत्तम-राठौड़ की चुप्पी में छिपी क्या कहानी!
सुपर संडे की कहानी । पोपटलाल की जुबानी
कभी सत्ता के गलियारों में कद्दावरों की तरह दिखने वाले चेहरे… कभी मुख्यमंत्री पद के सबसे बड़े दावेदार… और आज हालात ऐसे कि खुद उनके समर्थक भी ‘डिंग’ हांकना छोड़ बैठे हैं। जी हां, हम बात कर रहे हैं मध्यप्रदेश के नरोत्तम मिश्रा और राजस्थान के राजेन्द्र राठौड़ की।
2023 के चुनाव से पहले तस्वीर बिल्कुल अलग थी। नरोत्तम, शिवराज से भी बड़े नेता के रूप में प्रोजेक्ट किए जा रहे थे, जबकि राजस्थान में राठौड़ को ‘सीएम इन वेटिंग’ कहा जाने लगा था। प्रचार की हवा ऐसी थी कि दोनों को “सुपर CM” तक कहा गया।
लेकिन… चुनाव परिणामों ने सबकुछ बदल दिया। नरोत्तम और राठौड़ दोनों ही अपनी-अपनी सीटों से हार गए। हार के बाद भी समर्थकों का जादू कम नहीं हुआ—
कभी कहा गया कि इन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया जाएगा, फिर लोकसभा चुनावों में दिल्ली दरबार से मंत्री बनाए जाने की अटकलें चलीं। जब वहां जगह नहीं मिली तो राज्यसभा भेजने की कहानियां गढ़ी गईं। और जब राज्यसभा का टिकट भी नहीं मिला तो प्रदेश अध्यक्ष बनाने के सपने सजाए गए।
मगर नतीजा? कुछ भी नहीं हुआ।
आज हाल यह है कि जिनके नाम पर कभी गलियारों में फुसफुसाहट होती थी, वही नेता अब राजनीतिक मंच पर ‘सुपर साइलेंट’ नजर आते हैं। समर्थक भी समझ चुके हैं कि अब पीआर के सहारे ‘सुपर CM’ का झुनझुना बजाना व्यर्थ है।
सवाल साफ है—
क्या राजनीति में हार इंसान को एक झटके में किनारे कर देती है?
या फिर नरोत्तम और राठौड़ जैसे नेता चुप्पी साधकर वापसी का बड़ा मौका तलाश रहे हैं?
फिलहाल, जनता और राजनीति—दोनों ही चुप हैं।
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