बोतलबंद पानी का बढ़ता चलन चिंताजनक है

बोतलबंद पानी का बढ़ता चलन चिंताजनक है। प्योर, क्योर और सिक्योर वॉटर के दावों का बड़े पैमाने पर प्रचार प्रसार कर मल्टीनेशनल कंपनियों ने आदमी के दिमाग मे यह बात पूरी तरह बिठा दी कि सबसे शुद्ध पानी बोतलबंद होता है। जबकि यह अधूरा सच है। आश्चर्यजनक बात तब और हो जाती है जब राज्य सरकारें इसके उपयोग को बढ़ावा देती हों। अफसरों से लेकर मंत्रियों और मुख्यमंत्री तक के बंगले पर आमजनों के लिए बोतलबंद पानी परोसा जा रहा है। यह अच्छी बात है लेकिन इससे सेहत पर पड़ने वाले कुप्रभावों को नजरअंदाज करना क्या ठीक है ? इसके उपयोग से सरकारी खजाने पर प्रतिदिन कितना बोझ आता होगा,विचारणीय है। यानी आदमी के के साथ सरकारी बजट का नुकसान । मिट्टी के बर्तनों को विकल्प के तौर पर प्रयोग में लाने की क्रांतिकारी पहल सरकार के मुखिया करने लगें तो एक बड़ा बदलाव निश्चित होगा। दूसरा मिट्टी के कारीगरों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। मल्टीनेशनल कंपनियों ने बाजारवाद में पानी जैसी सर्वसुलभ वस्तु को कितना महंगा बना दिया है। सोचकर दुःख होता है। जिस बोतलबंद पानी को हम शुद्ध मानकर्वपी रहे हैं उसकी असलियत लोग कम जानते हैं। जितना सम्भव हो RO वॉटर और बोटल वाटर कम पिएं।
