नमन आपके व्यक्तित्व को।

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समय के आगोश में एक निश्चित समय में हम सब समा जाते हैं। कब, कहां और कैसे यह भी समय ही तय करता है। समय के दिये हुए समय में जो यात्रा हम करते हैं वह तारीख में याद रहती है। हमारे अच्छे बुरे कार्यों की समीक्षा भी समय ही करता है।‌समय हमारा कर्म क्षेत्र भी तय करता है। जितना समय एक आदमी को मिले वहीं उसकी उम्र है।
जन्म से मृत्यु तक हर मनुष्य स्वजनों के प्रेम पास में ग्रह नक्षत्रों की तरह अपनी परिक्रमा में 24 घंटे व्यस्त रहता है। अचानक अपनी धुरी से अलग हो जाता है आदमी। परिक्रमा समाप्त।
इसी परिक्रमा में पिताजी 97.5 की उम्र में हमें छोड़ कर चले गये। सनातन धर्म कालेज लाहौर के उस जमाने के संस्कृत आचार्य थे।भारत के विभाजन की विभीषिका के वे चश्मदीद साक्षी थे।लाहौर में जिन्ना के भाषण ,दंगे, आगजनी सब कुछ उन्होंने अपनी आंखों से देखा था। 1947 में लाहौर विश्वविद्यालय के सारे दस्तावेजों में आग लग जाने का खामियाजा उन्होंने ताउम्र झेला। सारी डिग्रियां और सार्टिफिकेट न मिलने के कारण उन्होंने पुनः शिक्षा प्राप्त की । पाणिनी व्याकरण के प्रकाण्ड पंडित थे वे। शांत और गंभीर स्वभाव उनके व्यक्तित्व की पूंजी थी। देवी मां के अनन्य साधक थे।‌ प्रायमरी शिक्षा में चिल्किया में मैं और बड़े भाई साहब उनके साथ रहते थे। जीवन में नियम और साधना के गजब के पक्के थे। जनवरी का महिना अपर हिमालय की ठंड में भी एक किलोमीटर पैदल जाकर प्रात: 5 बजे गंगा स्नान कर लौट आते थे। उनके ठहाकों की चर्चा आज भी गांव में होती है। पूरा जीवन शिक्षा क्षेत्र को समर्पित रहा। आज आप जीवित होते तो 99 बर्ष के हो जाते। (26 अप्रैल 1926 तारीख )। नमन आपके व्यक्तित्व को ।

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