बच्चे की गर्दन काली तो ये डायबिटीज का लक्षण
आज 14 नवंबर को दुनिया डायबिटीज डे मना रही है। भारत में इसके साथ चिल्ड्रंस डे भी मनाया जा रहा है। इन दोनों दिनों का एक साथ आना पहले संयोग हो सकता था लेकिन अब इनका गहरा कनेक्शन है।
भारत में नवजात से 14 साल तक के 10 लाख से ज्यादा बच्चे जानलेवा टाइप वन डायबिटीज से ग्रसित हैं। 40 की उम्र में होने वाला टाइप-2 डायबिटीज भी अचानक 12 साल के बच्चों में कई गुना तेजी से बढ़ गया है। मध्यप्रदेश में डायबिटीज के शिकार बच्चों की संख्या एक लाख से भी ज्यादा है। डॉक्टर्स इसके पीछे 35 की उम्र के बाद होने वाली शादियों को भी अहम कारण मान रहे हैं।
दैनिक भास्कर ने वर्ल्ड डायबिटीज डे और चिल्ड्रंस डे पर डायबिटीज और बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर्स का पैनल बनाया। बच्चों में डायबिटीज क्यों हो रहा है? खतरे क्या हैं? इसके कारणों के साथ बच्चों और माता- पिता के जीवन में क्या असर हो रहा है? इन सब मुद्दों पर विशेषज्ञों से बात की। पढ़िए रिपोर्ट…

भास्कर के सवाल और एक्सपर्ट्स के जवाब…
सवाल: टाइप-1 और टाइप-2 डायबिटीज किसे कहते हैं? जवाब: डाॅ. सोमनाथ रघुवंशी ने बताया कि टाइप-1 डायबिटीज शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता और डीएनए के कारण होती है। इससे ग्रसित व्यक्ति के शरीर में इंसुलिन बनाने की क्षमता ही खत्म हो जाती है। अग्नाश्य ग्रंथि में इंसुलिन बनाने वाले बीटा सेल्स शरीर के ही खिलाफ काम करने लगते हैं। इसे दवाओं से ठीक या काबू में नहीं किया जा सकता। बीमारी के पता लगते ही इंसुलिन के इंजेक्शन देने पड़ते हैं।
100 में से 85 पेशेंट टाइप-2 डायबिटीज के शिकार होते हैं। इसमें शरीर में इंसुलिन की कमी नहीं होती लेकिन इंसुलिन को जिन ऊतकों पर असर करना चाहिए, वहां तक वह पहुंच ही नहीं पाती है। इसका सबसे बड़ा कारण खराब जीवन शैली और गलत खान-पान है।

सवाल: बच्चों में डायबिटीज की बीमारी क्यों बढ़ रही है? जवाब: डॉ. रजनीश जोशी का कहना है कि बच्चों में टाइप वन डायबिटीज ज्यादा होती है। यह जन्म लेने के तुरंत बाद भी हो सकती है और 70 साल की उम्र में भी। इसका संबंध न तो व्यायाम से है और न ही मोटापे से। यह शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता के खिलाफ एंटीबॉडीज बनने के कारण होती है। एंटीबॉडीज अग्नाशय में इंसुलिन बनाने वाले आइलेट सेल्स को खत्म कर देती है, जिसकी वजह से शरीर में इंसुलिन बनना ही बंद हो जाता है।
दूसरा कारण आनुवांशिक है। कई बच्चों के माता-पिता, दादा-दादी को डायबिटीज होता है। इसे माेनोजेनिक डायबिटीज कहते हैं। कई जीन इसके होने का कारण होते हैं। इनमें से अगर एक जीन में भी डिफेक्ट हुआ तो टाइप वन डायबिटीज होना तय है।
माता-पिता 2-3 साल के बच्चों को टॉफी, बर्गर, पिज्जा, चॉकलेट खाने को देते हैं। ये कम फाइबर के साथ हाई कैलोरी, शुगर और वसा से भरे होते हैं। एक बच्चे को दिनभर में जितनी कैलोरी की आवश्यकता होती है, एक बर्गर या पिज्जा उससे कई गुना ज्यादा कैलोरी पहुंचा देता है। इससे बच्चों में मोटापा बढ़ने लगता है, जाे डायबिटीज का कारण बनता है। भारत में अभी एक प्रतिशत से ज्यादा बच्चों को टाइप-2 डायबिटीज है।

सवाल: डायबिटीज की वजह से बच्चों को क्या-क्या परेशानियां आती हैं? जवाब: एम्स डायरेक्टर डॉ. अजय सिंह बताते हैं कि सेंट्रल और नाॅर्थ इंडिया में गेहूं का प्रचलन बहुत ज्यादा है। यहां डायबिटीज के केस भी देश के दूसरे हिस्सों से ज्यादा हैं। टाइप-वन डायबिटीज के कारण बच्चे की पूरी जिंदगी असामान्य हो जाती है।
उसे रोज 4 बार इंसुलिन के इंजेक्शन लगते हैं। दिन में 4 बार डायबिटीज की जांच होती है। स्कूल में इंसुलिन के इंजेक्शन लगते हैं। घर में भी एक्स्ट्रा प्रीकाॅशन रखे जाते हैं। बचपन में ही खान-पान में बंदिशें लग जाती हैं। टॉफी- चॉकलेट बंद हो जाते हैं। मीठा तो दुश्मन ही बन जाता है।
फिर भी कभी शुगर बढ़ गई तो ठंड और कंपकंपी होने लगती है। शारीरिक कमजोरी आ जाती है। इम्यून सिस्टम कमजोर होने से दूसरी बीमारियां घेर लेती हैं।
सवाल: क्या बच्चों में डायबिटीज के केस बढ़ने के खास कारण हैं? जवाब: डॉ. महेश माहेश्वरी बताते हैं कि कोविड के बाद से बच्चाें की जीवनशैली बदल गई है। कई बच्चों ने आउटडोर गेम खेलना बंद कर दिया है। ज्यादातर समय मोबाइल यूज करते हुए, टीवी देखते हुए और घर में बैठे- बैठे निकालने की आदत पड़ गई है। इसका बहुत बुरा असर उनके शरीर पर पड़ा है।
पहले बच्चों में टाइप-2 डायबिटीज होना बहुत रेयर था लेकिन अब ये आम हो गया है।

सवाल: देर से शादी के बाद हुए बच्चों में क्या डायबिटीज के ज्यादा खतरे होते हैं? जवाब: लेट मैरिज का ट्रेंड बढ़ गया है। खराब लाइफ स्टाइल के कारण युवाओं में मोटापा, तनाव, थकान और स्टेमिना कम होने की समस्याएं बढ़ रही हैं। शुगर लेवल बढ़ा हुआ रहता है। जितनी देरी से शादी होगी, उतनी देरी से गर्भधारण होगा। इस स्थिति में पैदा होने वाले नवजात में भी मोटापा जैसी समस्याएं रहती हैं और बचपन में ही उनमें डायबिटीज जैसी समस्याएं हो जाती हैं। 30-35 की उम्र के बाद होने वाली शादियों के कारण ऐसे मामले बढ़ रहे हैं।
सवाल: बच्चों की डायबिटीज में माता-पिता की क्या भूमिका होती है? जवाब: बच्चों में वजन बढ़ना, थकान महसूस होना, गर्दन काली पड़ना, ज्यादा पेशाब आना ये डायबिटीज होने से पहले के संकेत हैं। अगर समय रहते प्रीकॉशन अपना लिए जाएं तो डायबिटीज से बचा जा सकता है। ये जिम्मेदारी माता-पिता की ज्यादा है कि वो लक्षण देखते ही जरूरी कदम उठाएं।
बच्चे को दिन में तीन से चार इंसुलिन के इंजेक्शन लगते हैं। 7- 8 साल के बच्चे के मां-बाप के लिए यह बड़ा ही दर्दनाक होता है। बच्चे के रखरखाव के साथ माता-पिता ये भी सीखते हैं कि कैसे इंसुलिन देना है, ब्लड शुगर की मॉनिटरिंग करनी है। बच्चे के साथ डाइट के अनुशासन भी फॉलो करने पड़ जाते हैं। स्कूल में मॉनिटरिंग करनी पड़ती है। कई बार मां-बाप बच्चों के चिड़चिडे़पन का सामना करते हैं। उन्हें धैर्य दिखाने की जरूरत होती है।

सवाल: कैसे इस बीमारी से बच्चों को छुटकारा दिलाया जा सकता है? जवाब: डाॅ. सचिन चित्तावर कहते हैं कि टाइप-1 डायबिटीज के शिकार बच्चों को जीवनभर इंसुलिन लेना होगा। उनके पास कोई और ऑप्शन नहीं है लेकिन इंजेक्शन से छुटकारा मिल सकता है। समय के साथ नए इनोवेशन हो रहे हैं, जिनमें पेंक्रियाज के डिवाइस हैं, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस वाले पंप हैं।
इसका एक इलाज सिर्फ टेबलेट्स से भी हो सकता है लेकिन उसके लिए सजगता बहुत जरूरी है। टाइप-1 डायबिटीज के 3 स्टेज होते हैं। पहले और दूसरे स्टेज में लक्षण दिखते हैं लेकिन शुगर कंट्रोल में रहती है। एंटीबॉडीज भी पॉजीटिव रहती हैं।
डॉ. चित्तावर कहते हैं कि पेंक्रियाज में बीटा आइलेट सेल्स इंसुलिन बनाते हैं। इन्हीं सेल्स को एकत्रित करके अग्नाशय (पेंक्रियाज) में डालते हैं। यहां पहुंचकर ये बीटा सेल्स बनाने लगते हैं। इस तकनीक से डायबिटीज के मरीजों को इंसुलिन इंजेक्शन से छुटकारा मिल सकता है।
अभी भारत में यह तकनीक शुरुआती फेज में है। किस मरीज का इलाज हो सकता है और किस उम्र में हो सकता है, इन सब बातों पर रिसर्च चल रही है। इसमें प्रारंभिक सफलता डॉक्टर्स को मिली है।

सवाल: क्या एहतियात रखें कि आने वाली पीढ़ी में ये बीमारी हो ही न? जवाब: डॉ. सोमनाथ रघुवंशी ने बताया कि आने वाली पीढ़ी कितनी फिट होगी और शुगर से बच पाएगी, ये बहुत हद तक आज की युवा पीढ़ी पर निर्भर करता है। अभी जो वयस्क हैं, वो भविष्य में माता- पिता बनेंगे। उनके फूड हैबिट्स में कार्बोहाइड्रेट रिच डाइट, तनाव, आलस, मोटापा रहेगा तो इसका प्रभाव आने वाली पीढ़ी पर देखने को मिलेगा।
युवतियों में मोटापा बढ़ेगा तो प्रेगनेंसी के दौरान शुगर बढ़ने की समस्या रहेगी। जन्म के समय बच्चे का वजन अधिक होगा और कुछ सालों में उसके डायबिटीक होने के आसार बहुत बढ़ जाएंगे।
आज की युवा पीढ़ी एहतियात रखे तो बच्चों काे इस बीमारी से बचाया जा सकता है। आंकड़े बताते हैं कि प्रतिवर्ष करीब 90 फीसदी प्री डायबिटीज स्टेज से लोग डायबिटीज से बच जाते हैं। अगर वजन न बढ़ने दें, फिजिकल एक्टिव रहें, कार्बोहाइड्रेट रिच फूड्स अवॉइड करें तो प्री डायबिटीज की स्थिति से भी बच सकते हैं।

सवाल: डायबिटीज वयस्कों और बच्चों काे कैसे प्रभावित करती है? जवाब: डॉ. रजनीश जोशी बताते हैं कि डायबिटीज के कारण मोटापा बढ़ना, इम्यून सिस्टम कमजोर हाेना और स्टेमिना घटना जैसी समस्या आने लगती हैं। ये रिस्क फैक्टर हर उम्र में कॉमन है लेकिन ये कितने साल से प्रभावित कर रहे हैं, इसका फर्क पड़ता है।
12 साल की उम्र से इस बीमारी से पीड़ित बच्चा, इस बीमारी की वास्तविक उम्र 35 तक पहुंचेगा, तब- तक उसकी डायबिटीक उम्र 23 साल हो चुकी होगी। यानी जिस उम्र के लोगों में ये बीमारी होती है, उस उम्र तक वो 23 साल से डायबिटीज का दुख झेल रहा होगा। इसका मतलब है कि डायबिटीज वयस्कों से दोगुना ज्यादा बच्चों को प्रभावित करती है।
सवाल: दोनों डायबिटीज बच्चों के लिए कितनी खतरनाक हैं? जवाब: टाइप वन डायबिटीज बच्चों की जान तक ले सकती है। समय पर इंसुलिन नहीं लेने से डायबिटिक कीटोएसिडोसिस जैसी गंभीर बीमारी हो सकती है। साथ ही डायबिटिक कोमा, खतरनाक इंफेक्शन जैसी समस्याएं हाे सकती हैं। शरीर की ग्रोथ नहीं होगी।
टाइप- 2 डायबिटीज से हार्ट के ब्लॉक स्ट्रोक या किडनी प्रेशर होने लगता है, जो घातक है।

सवाल: माता-पिता डायबिटीज वाले बच्चों की केयर कैसे कर सकते हैं? जवाब: डॉ. महेश माहेश्वरी ने बताया कि हमारे पास ग्रामीण आदिवासी इलाकों से टाइप वन डायबिटीज के बच्चे आते हैं। कई बच्चों के परिजन पढ़े-लिखे नहीं होते। आर्थिक स्थिति सही नहीं होती। इंसुलिन के इंजेक्शन रखने के लिए फ्रिज तक नहीं होते। बच्चे को दिन में चार बार इंसुलिन का इंजेक्शन लगाना, 4 बार शुगर टेस्ट करना उनके लिए बहुत कठिन होता है। स्कूल उन बच्चों को एडमिशन देने से मना कर देते हैं, जिनको इंसुलिन लगाना पड़ता है।
डॉ. माहेश्वरी ने कहा- इसके लिए हम एक ग्रुप चलाते हैं जिसमें एक्सपर्ट डॉक्टर्स, रेसिडेंट डॉक्टर्स और मैं हूं। एम्स में हर शुक्रवार को 2 से 4 बजे तक टाइप 1 डायबिटीक बच्चों के लिए स्पेशल क्लीनिक चलता है।
मोटापा दूल्हा होता है। जहां दूल्हा आता है ,वहां बाराती खुद-ब-खुद आने लगते हैं। सबसे पहला बाराती डायबिटीज आता है और दूसरे बारातियों को भी यही लेकर आता है।
बड़ों को अनुशासन से बाध्य किया जा सकता है लेकिन बच्चे को खाने- पीने, खेलने, घूमने के लिए बाध्य करना बहुत कठिन होता है। इसी उम्र में मन सबसे ज्यादा चंचल होता है इसलिए उन्हें प्यार से समझाना चाहिए।

